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Wednesday, 23 August 2017

चंद्रोदय - 11

(गतांक से आगे )
(भाग-2)

रानी मल्हना के सामने गुलाबी रंगत का गोरा चिट्टा, बढी हुई दाढ़ी,कसा हुआ शरीर, बहुत अच्छी लम्बाई का, ख़ूबसूरत नवजवान खड़ा हुआ था, दोनों समझ गये यही ताला सैय्यद है |

“आप भी यहाँ गंगा स्नान के लिये आये हुये है?” मल्हना ने सैय्यद से पूंछा 
 
“हाँ, यही समझ लीजिये, जा तो रहा था कनवज लेकिन सुना की यहाँ दसहरा मेला लगा है तो मेला देखने यही रुक गया” सैय्यद ने बताया|

“कनवज ? कोई विशेष काम था या यूं ही घूमने या फिर राजा का कोई सन्देश ?” मल्हना ने पूंछा

“नही, बस नौकरी की तलाश में” सैय्यद ने बताया|

“नौकरी ? क्या कनवज में ही जरूरी है ? नही तो हमारे साथ महुबे चलिये, महुबे के सरदार बनिये”

मल्हना ने प्रस्ताव दिया|

सैय्यद सोंच विचार में पड़ गया |

“सोचो मत वीर योद्धा, आप वीर है, साहसी है, न्याय के लिये, स्त्री के स्वाभिमान के लिये, आप विना जान पहचान के लड़ सकते है, ऐसे योद्धा का सम्मान सभी जगह होता है, मै गढ़ महुबे की महारानी मल्हना हूँ यदि आप सहमत हो तो मै आप को महुबे के राजपुत्रो की अच्छी शिक्षा के लिये उनका गुरु नियुक्त करती हूँ आप उन्हें युद्ध विद्या की शिक्षा दीजिये” मल्हना ने अपना प्रस्ताव पूरा किया|
ताला सैय्यद ने सहमति में सर हिला दिया |

“महारानी, आप कुशल तो है ना ?” दक्षराज ने आगे बढ़ कर पूंछा|

“हाँ, सरदार, इस साहसी योद्धा के कारण मै कुशल हूँ” रानी मल्हना ने मुस्कुरा कर कहा|

“आपका बहुत बहुत धन्याबाद आभार वीर योद्धा” कहकर दक्षराज ने आगे बढ कर सैय्यद को गले लगा लिया|

“गढ़ महुबा आपका आभारी है, हमारी मित्रता स्वीकार करे मान्यवर” बक्षराज भी गले लग गया|

“मेरा सौभाग्य है, आपका यह सम्मान” कह कर ताला सैय्यद ने दोनों को बाहे फैला कर गले लगा लिया|

“मुसलमान हो कर हिंदी का इतना ज्ञान ?” मल्हना ने  आश्चर्य से पूंछा|

“महारानी, जन्म से मुसलमान जरूर हूँ परन्तु मेरी शिक्षा, लालन पोषण सब विद्वानों की नगरी वाराणसी में हुआ है, संस्कार भी मुझे हिन्दू विद्वानों से प्राप्त हुये है, यही कारण है की मुझे हिन्दू मान्यताओं का भी ज्ञान है और मुस्लिम परम्पराओं का भी, मै आपके साथ गढ़ महुबे चल रहा हूँ आपका नमक खाऊँगा मुसल्ल ईमान है मेरा, वचन देता हूँ, नमक का हक अदा करूँगा मर जाऊँगा लेकिन कभी भी महराज का भरोषा नही मिटने दूँगा, मेरा वचन ही मेरा ईमान है, मेरा दीन धर्म है” ताला सैय्यद ने दाहिना हाँथ ऊपर उठा कर कहा|

“हमें आप पर पूरा भरोषा है मित्र” बक्षराज ने हाँथ पकड़ते हुये कहा|

“ताला सैय्यद नाम है मेरा, आप मुझे सैय्यद कहे सरदार” ताला सैय्यद ने बक्षराज के कंधे पर हाँथ रख कर कहा |

दक्षराज, बक्षराज और रानी मल्हना तीनो मुस्कुरा दिये |

दक्षराज और बक्षराज का ध्यान अपने सैनिको पर गया जो दर्द से कराह रहे थे, दक्षराज उनकी चोटों पर लेप लगवाने लगा, बक्षराज ने रानी से पूंछा “रानी आप मुझे आदेश दीजिये मै अभी उस दुष्ट करिंघा की नाक में नकेल डाल कर, पालतू जानवर की तरह आपके सामने खड़ा कर दूँ”

“नहीं सरदार, महाराज ने चलते समय मना किया था की किसी से भी ब्यर्थ उलझना नही, मै ठीक हूँ इसलिये किसी से भी कोई युद्ध नही, आप सब कल सुबह भोर में ही वापसी की तैय्यारी कीजिये, हम स्नान कर चुकी, मेला भी देख चुकी है अब वापस चलिये, नहीं तो अगर कही महाराज को पता चला की युद्ध हुआ है तो हमें दुबारा कही भी जाने की अनुमति नही मिलेगी” रानी मल्हना ने कहा

“जैसी महरानी की आज्ञा” बक्षराज ने सिर झुका कर कहा

“सरदार सैय्यद आप भी तैय्यारी कर ले कल भोर में आप भी हमारे साथ प्रस्थान करेंगे” रानी ने सैय्यद से कहा

सैय्यद ने सिर झुका कर सहमति दी |

क्रमशः
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is famous for his unpublished Novel "AARYAN - EK ALOKIK YOUDHA(आर्यन - एक अलौकिक योद्धा)". Mostly authors known for his English Novels but he is standing in the same lobby for his Hindi novels. Currently his Novel "KAUN JEETA AUR KYU (कौन जीता और क्यों)" is available on all e-commerce websites and leading Bookstores. it is another step of success and he enjoying its bestselling. his another Book is also ready to publish name "PARO KE DIYE (पारो के दीये)" and will be available in 2017.

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