(गतांक से आगे )
माड़ोगढ़ का राजकुमार करिंघा जब माड़ोगढ़ से जाजमऊ के लिये चला वह अपनी माँ कुशला से आशीर्वाद लेने गया वही उसकी बहन विजना भी उपस्थित थी | सामान्य रूप से विजना ने अपने भाई करिंघा से पूछा-
“मेरे लिये मेला से क्या लाओगे ?”
“बोल तुझे क्या चाहिये? वही ले आऊंगा” करिंघा ने खुश हो कर
पूछा
“भैया मेरे लिये ऐसा कुछ लाना जो दुनिया में मेरे अलावा
किसी के भी पास ना हो” विजना ने कहा
“ऐसा क्या होता है ? जो दुनिया में किसी के भी पास न हो”
करिंघा ने आश्चर्य के साथ पूछा
“नौलखा हार” विजना ने हसँते हुये कहा
“क्या नौलखा हार ? चल तेरे लिये नौलखा हार ही लाऊंगा”
करिंघा ने गर्व के साथ कहा
“ऐ बेटा, नौलखा हार मेलो ठेलो में नही मिलते, नाहक परेशान
ना होना, नौलखा हार केवल मेरी बहन मल्हना के पास है और कही भी किसी के पास नौलखा
हार नही है, तुम तो विजना के लिये कपडे, आभूषण आदि ही कुछ ले आना, वही पर्याप्त
है” सारी वार्ता सुन रही कुशला ने अपने पुत्र को समझाया |
“नही माँ, मै राजा
जम्बे का पुत्र हूँ जो हमें रुच जाये तो वो हम ले ही लेते है चाहे सरलता से मिले
या तलवार की नोक से हमें मिले” करिंघा ने जोश मिले धमंड के साथ कहा
“ऐ बेटा, इस जोश में तुम कही महुबे के बनाफरो से अनावाश्यक उलझ ना जाना ......समझे, जाओ गंगा
स्नान करो और सकुशल वापस आओ” कुशला ने करिंघा को फिर से समझाया |
“जी” बोल कर करिंघा वापस चल दिया
करिंघा सबसे विदा ले जाजमऊ गंगाघाट के दसहरे मेले में आ
गया, गंगा स्नान के बाद वह अपनी बहन विजना के लिये खरीददारी करने निकल पड़ा, वही
घूमते घूमते उसकी भेट उरई के राजा माहिल से हो गई |
“राम राम मामा” करिंघा ने माहिल को देखते ही अभिबादन किया
“राम राम राजकुमार” माहिल ने कहा
सामान्य भेट वार्ता से माहिल को पता चला की करिंघा की बहन
ने मजाक में करिंघा से नौलखा हार माँगा है |
“राजकुमार करिंघा, नौलखा हार तो केवल गढ़ महुबे की रानी
मल्हना के पास ही मिलेगा, दूसरा तो मिलाने से रहा” माहिल ने सुझाव दिया
“वो तो मौसी देने से रही” करिंघा ने कहा
“क्या भांजे ? राजा जम्बे के पुत्र हो कर भी इस प्रकार
कायरों सी बांते, राजा जम्बे की तलवार का डंका पूरे भारत वर्ष में बजता है बड़े बड़े
योद्धा भी जिसके नाम से भय खाते हो उसका पुत्र और इस प्रकार किसी से कुछ मांगेगा
तो क्या अच्छा लगेगा ? शक्तिशाली राजा के लडके हो जो माँगने से मिलो ले लो, जो
मांगने से ना मिले उसे अपनी ताकत से छीन लो” महिल ने अपनी कूटनीतिक बांटे शुरू कर
दी
“लेकिन .............?” करिंघा सोंच में पड़ गया
“लेकिन वेकिन कुछ नही, वीर भोग्या वसुंधरा, हांथी, घोडा,
सैनिक हर बल में सर्वश्रेष्ट हो, जिसमे सामर्थ्य होती है वही सब सुखो का अधिकारी
होता है ...... इसलिये जाओ मेरे प्रिय बहादुर राजकुमार, माँगने पर अगर मेरी बहन
तुम्हे नौलखा हर दे दे तो शांति पूर्वक ले लेना अगर शांति से ना दे तो अपनी ताकत
से छीन लो उससे वो हार जिसकी वो सुरक्षा भी कर सकती उसे इतना कीमती हार रखने का
कोई अधिकार नही” माहिल ने करिंघा को बड़े प्यार से समझाया
“लेकिन मामा मैंने तो सुना है महुबे के बनाफर सरदार बहुत
पराक्रमी योद्धा है उन्हें हराना असंभव है, बड़े लड़ैया गढ़ महुबे के मैंने तो यही
सुना है, अगर वो मुझे पा गये तो क्या छोड़ेंगे?” करिंघा ने शंका ब्यक्त की-
“वो बनाफर, जंगली, असभ्य वो काहे के योद्धा ? उन्हें तो
युद्ध के नियम भी नही पता होंगे, तुम उनसे डर रहे हो ......... चलो कोई बात नही,
तुम्हारा मामा किस दिन काम आयेगा जब डेरे में दोनों दक्षराज और बक्षराज बनाफर नही
होंगे मै तुम्हे बता दूंगा, तुम अपनी मौसी से मिलने के बहाने जाना और हार मांगना
दे दे तो ले आना अगर ना दे तो हार लूट लेना, वो ठहरी औरत जात अकेली तुम्हारा कुछ
नही बिगाड़ पायेगी और अगर कोई सैनिक आ भी जाये तो तुम सक्षम हो निपटा देना उसे, हाँ
इतना है हार मिलते ही माड़ोगढ़ भाग जाना, हार के लिये राजा परिमल माड़ोगढ़ जा कर लड़ाई
करे इतनी हिम्मत नही है उसमे” महिल ने कुटिलता पूर्वक समझाया
“एक बात बताओ मामा, आप मुझ पर इतना मेहरबान क्यों हो ? जैसे
मेरी माँ आपकी बहन है वैसे ही मेरी मौसी भी तो आपकी बहन है, फिर आप मेरा साथ क्यों
दे रहे हो ?” करिंघा ने मुस्कुरा कर पूछा
“कोई मेहरबानी नही है ये भांजे, ये महुबे बालो ने मेरे बाप
दादा के समय से चला आ रहा मेरा कालिंजर और महुबे का किला मुझसे छीन लिया, तो मै
कभी इनका भला नही सोचता, मेरे शत्रु है ये और मै इनके हर शत्रु का मित्र हूँ”
माहिल गुस्से में बोला
“ठीक है मामा, मुझे उससे क्या मुझे तो केवल नौलखा हार
चाहिये चाहे जैसे मिले, आप तो मुझे उचित समय पर बता देना जब बनाफर डेरे में ना हो”
बोल कर करिंघा चल दिया |
माहिल मुस्कुरा दिया, उसे लगा उसकी कुटिल योजना सफल हो गई |
अगर करिंघा नौलखा हार ले गया तो चंदेल माड़ोगढ़ जा कर युद्ध करने से रहे तो हर तो
जायेगा ही साथ ही उनकी रानियाँ भी सुरक्षित नही ये कलंक तो लगेगा ही और यदि चंदेल
युद्ध करने माड़ोगढ़ गये तो माड़ोगढ़ के बघेल कमजोर भी नही है, चंदेल वंश का अंत करके ही
मानेगे, दोनों ही दशाओं में माहिल को ख़ुशी मिलेगी | बस सही समय की प्रतीक्षा थी|
क्रमशः
copyright@Ambika Sharma
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