(गतांक से आगे )
“बेटा ! सुनो, हम भूखे और
प्यासे है हमें पानी दे दो, हमें खाना दे दो, हमें कमंडल चाहिये दिलवा दो, हमें
मुक्ति दिलवा दो, दिलवा दो बेटा, तुम ही दे दो ........सुन लो बेटा हमारी” दो
अद्भुत तेज बाले साधू महात्माओं ने ऊदल से कहा
एक दम श्वेत
वस्त्र, उन्नत मस्तिष्क में रक्त तिलक, सफ़ेद बालों के साथ तेजमई चेहरा लेकिन हांथो
में चिमटा की जगह तलवार ? गले में रुद्राक्ष की माला की जगह आभूषण ? कलाईयों में
स्वर्ण कड़े ? ये कैसे सन्यासी है ? जिनके मुख मंडल में तेज तो है लेकिन वेशबूशा
एकदम विपरीत, ये जगह कौन सी है ? मै कहाँ आ गया ? ऊदल मष्तिष्क पर जोर डाल रहा था
लेकिन सोंच नही पा रहा था | वो गया, पानी ले कर आया, महात्माओं को पानी दिया,
लेकिन ये क्या पानी पीने के पहले ही वर्तन खाली हो गया | महात्मा अब भी प्यासे है,
ऊदल फिर भागा लेकिन वो तो दौड़ भी नही पा रहा, फिर पानी लेकर आया लेकिन फिर वही,
महात्मा फिर प्यासे है | ये कैसा तिलश्म है ? ऊदल में माथे पर पसीना की बूदें
छलकने लगी | घबडा गया ऊदल लेकिन उसने खुद पर नियंत्रण रख कर पूंछा
“आप कौन है ? कहाँ से आये है ? और ये जल आप पी क्यों नही पा
रहे ? यह क्या रहस्य है ?”
“बेटा, हम अभागे पिछले बीस वर्षो से प्यासे है, अतृप्त है,
तूम ही हमें तृप्त कर सकते हो, हमें मुक्ति दिला दो बेटा” एक महात्मा ने ऊदल से
कहा
“मै तो आपको पानी दे रहा हूँ, आप को मिल क्यों नही रहा ?”
ऊदल ने हाँथ जोड़ कर पूंछा
“हम ऐसे पानी नही पियेगे, पहले हमारा अंतिम संस्कार करवाओ,
वो देखो बरगद के पेड़ पर हमारा सिर लटका है ......वो देखो” दूसरे महात्मा ने ऊदल को
बताया
ऊदल ने पलट कर पीछे देखा, सामने बरगद का पेड़ था जिस पर दो
नर कंकाल टंगे थे | ऊ दल शंका से भर गया, ये कहा मै भूत प्रेत की नगरी में आ गया,
मै तो माँ चंद्रिकन का दास, गुरु गोरक्ष नाथ का शिष्य, मेर सामने भूत प्रेत कहाँ
से आ गये, कुछ तो गड़बड़ है ? लेकिन ये है क्या ? ऊदल पलट कर भागा पूरा जोर लगा लिया
लेकिन पैर उठ क्यों नही रहे? मै चल क्यों नही पा रहा? मेरे हाँथ पैर जम क्यों गये
? ऊदल पूरी ताकत लगा रहा था, पसीने से लतपथ, लेकिन असहाय, मष्तिष्क शून्य, घबडाहट
जोरो पर तभी आवाज आई “रुको बेटा, रुको ..........बेटा रुको, हम तुम्हारे शत्रु नही
है ....... रुको”
पसीने में डूबा, घबडाया ऊदल जोर से चीखा
“जय माँ चन्द्रिका .......जय गुरु गोरख नाथ की”
ऊदल की नीद खुल गई, उठ कर बैठ गया, ह्रदय की धड़कन बड़ी हुई
थी, पसीने से नहाया हुआ ऊदल |
“हे माँ यह स्वप्न था” ऊदल ने गहरी सांस ली |
भोर का समय हो रहा था | ऊदल ने दो दिन से कुछ खाया पिया नही था तो राजदरवार से वापस आकर
खा पी कर गहरी नीद में सो गया था | गहरी नीद में पता ही नही नही चला दिन बीत गया,
रात बीत गई, गहरी नीद में यह स्वप्न देखा ऊदल ने, अब ऊदल सोच रहा था
“क्या अर्थ है इस सपने का
? कौन है ये महात्मा ? जो इतने वर्षो से प्यासे
है ? जिन्हें मै ही पानी पिला सकता हूँ, मुक्ति भी चाहिये ? ............कही पानी
अर्थ तर्पण तो नही ? मुक्ति तो पुत्र ही दिलवाता है पिता को तो क्या ये मेरे पिता
है जिन्हें मुक्ति चाहिये ? या तर्पण करवाना है मेरे पिता का ? उनके सिर बरगद के
पेड़ पर टंगे है .........तो की मामा माहिल सच कह रहे थे ?फिर सब मुझसे झूठ क्यों
बोलेंगे ? क्या है यह रहस्य ?” ऊदल की उलझने बढ
रही थी, ऊदल का सिर चकराने लगा “नही नही ये मेरे पिता नही है अगर ये मेरे पिता
होते तो दद्दा आल्हा के पास जाते फिर वो तो क्षत्रिय होने के नाते युद्ध भूमि में
वीरगति को प्राप्त हुये तो उन्हें तो धर्म निभाते मरने से यूं ही मुक्ति प्राप्त
हो गई होगी, मेरे पिता नही है ये शायद ज्यादा सोचने के कारण मैंने ये ब्यर्थ का
सपना देखा ........लेकिन भोर में ? भोर का सपना तो सच होता है, क्या है ये ?”
ऊदल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, इस स्वप्न का रहस्य क्या है
? उलझन दिमाग में होती जा रही थी | ऊदल ने विस्तार छोड़ा, नित्य क्रिया, स्नान आदि
करके सीधे माँ चंद्रिकन जा पहुचा, माँ का ध्यान पूजन करके, गुरु के स्थान गया उलझन
से शान्ति नही मिली तो सीधा रानी मल्हना से मिलने रनिवास चल दिया |
क्रमशः
copyright@Ambika Sharma
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