भाग-(1)
(गतांक से आगे )
ऊदल और उसका घोडा दोनों हवा से बातें करते चले आ रहे थे,
लेकिन ऊदल उदास था, चारो ओर फैली हरियाली उसे अच्छी नही लग रही थी,चित्त सही हो, मन प्रसन्न हो तो सब कुछ अच्छा लगता है और
विपरीत स्थिति होने पर मनचाही चीजे भी बुरी लगाती है ऊदल के साथ भी आज यही हो रहा
था, उसे रह रह कर यही दुःख हो रहा था की उसके सब अपनो ने उससे इतनी बड़ी बात छिपाई
क्यों ? क्षत्रिय खून उसका खौल रहा था, सोते हुये उसके पिता की निर्मम हत्या? और
हत्यारा अभय हो कर राज कर रहा है ? बिना बदला लिये आनंद में घूम रहे है ? क्या
मेरा पिता अनाथ था ? जो किसी ने भी उसका बदला लेना जरूरी नही समझा ? बदला लेना तो
दूर मुझे बताने तक की जरूरत नही समझी ?
उदास गुमसुम
ऊदल ने देर रात गढ़ी दासराज पुरवा में प्रवेश किया, ऊदल इतना बिचलित था की उसने गढ़
महुबे जाना भी उचित नही समझा, बेन्दुला को अस्तबल में छोड़ा, खुद ऊदल अपने विश्राम
कक्ष में चला गया | सेवको ने भोजन के लिये पूंछा तो ऊदल ने मन कर दिया |अनमना सा
ऊदल रात भर चुप चाप लेता रहा| यद्यपि ऊदल की आयु इतनी ज्यादा नही थी की वह बड़े बड़े
निर्णय लेता इसीलिए उसे अपने सगो पर गुस्सा आ रहा था की खुद तो कुछ किया नही और
उसे भी बताया नही और एक हत्यारा निर्भय आजाद घूम रहा है |
शयन कक्ष की
गोल घुमाओदार नक्कासी ऊदल को बुरी लग रही थी, रेशमी और मखमली वस्त्र उसे चुभन दे
रहे थे ऊदल को रात भर सोंच विचार में नीद नही आई | दिन भर का भूखा प्यासा ऊदल बिना
सोये, अगले दिन भोर की प्रथम वेला में उठ बैठा, नित्य क्रिया स्नान आदि से निवृत्त
हो ऊदल ऊषा काल के पहले ही माँ चाद्रिका के स्थान पर चला गया उनका पूजन अर्चन कर,
अपने गुरु गोरक्ष के स्थान पर पंहुचा, अपने गुरु का ध्यान करता रहा यद्यपि ऊदल का
मन बार बार कह रहा था की इतना परेशान होने की जरूरत नही है यदि उसके पिता हत्यारा
स्वतंत्र घूम भी रहा है तो स्वयं ऊदल इसका बदला ले कर अपना क्षत्रिय धर्म निभाने
में सक्षम है फिर भी उसे अपने सगो से ये उम्मीद नहीं थी|
ऊदल
शांत भाव से उठा, समय भी राजा परिमाल के दरवार का हो चूका था| ऊदल ने वही जाने का
निर्णय लिया वहाँ पिता तुल्य राजा परिमाल के अतिरिक्त उसके बड़े भाई आल्हा, मलिखे,
सुलिखे भी मिलेगे | देखूँये सब क्या कहते है ? अगर ये सब बदला लेने के लिये राजी
नही होते तो फिर मै ताला सैय्यद से कोई नीति लेकर अकेला ही माडौगढ़ जाँउगा, या तो
बाप का बदला लूगा या फिर वही मर खप जाऊगा, इतना सोच कर ऊदल राज महल की ओर चल दिया
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क्रमशः
copyright@Ambika Sharma
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