_____ सत्य मेरा चिर हो, न हो | मधु सा रस हो, जीवन के लिए || शिव अपने सा संकल्प मुझे दो | लक्ष्य सधे, कर्म हो अर्पण के लिए _____ _________________________________________________Ambika Sharma__________________________________________________

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Sunday, 28 May 2017

चंद्रोदय - 4

(गतांक से आगे )

उरई के राजा माहिल ने ऊदल के मन में चिंगारी तो सुलगा दी थी लेकिन उससे कितनी आग लगी ये देखना बांकी था क्यों की माहिल जानता था की राजा परिमल में इतना साहस नही है की वो माड़ोगढ़ के शक्ति संपन्न जम्बे राजा के जाकर आक्रमण कर दे | बघेल शासक राजा जम्बे का राज्य सतलज नदी से नर्मदा नदी के मध्य फैला हुआ यह माड़ोगढ़ नर्मदा नदी किनारे बसा तत्कालीन अत्याधिक शक्ति संपन्न राज्यों में से एक था | राजा जम्बे और उसके पाँच पुत्र अत्याधिक क्रूर योद्धाओ में गिने जाते थे | माड़ोगढ़ का किला अजगर किला कहलाता था क्यों की जो इस किले में घुस गया वो कभी बाहर जिन्दा नही निकल पाया | माहिल को लगा की अगर ऊदल या उसका बड़ा भाई आल्हा, या फिर उसके चचेरे भाई मलिखे और सुलिखे कोई भी, या चारो  भाई जोश में आ जाये और माड़ोगढ़ चले जाये तो शायद बनाफर वंश का ही अंत हो जाये | वह कुटिलता से मुस्कुराया “मरे तो केसे भी” धीरे से बुदबुदाया | माहिल अपनी लिल्ली घोड़ी पर सवार हुआ और गढ़ महुबे चल दिया |

महुबे में दरबार की कार्यवाही चल रही थी |

“महाराज की जय हो” माहिल ने राजा परिमल के दरवार में राजा को अभिवादन किया |

“स्वागत है राजा महिल, आइये आपका स्वागत है” राजा परिमल ने स्वागत किया |

“महाराज ! आज मै एक उलाहना ले कर आया हूँ” माहिल ने सिर झुका कर कहाँ |

“उलाहना? कैसा उलाहना ? राजा माहिल स्पष्ट कहो” राजा परिमल ने पूंछा

“क्षमा करे महाराज, आपने इन बनाफारो को बहुत बढ़ावा दे रखा है ये असभ्य जंगली अब सिर चढ़ कर नाच रहे है” महिल ने कुटिलता पूर्वक कहा
इतना सुनते ही राजा परिमल का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा, मुठ्ठियाँ बंध गई, राजा क्रोध में चिल्लाये “राजा माहिल ! जिन्हें आप बनाफर कह रहे है वो चारो मेर लिये मेरे पुत्र जैसे है जितने प्रिय मुझे ब्रम्हा और चंद्राबल है उतने ही प्रिय मुझे ये चारो है”

उस समय दरवार में उपस्थित आल्हा, मलिखे और सुलिखे के चहरे भी लाल हो रहे थे |

माहिल समझ गया, वो गलत बोल गया है इसलिये सिर झुकाये शांत खड़ा रहा लेकिन राजा परिमल शांत नही हुये, वो आगे बोले “राजा माहिल ! अच्छी तरह समझ लीजिये, आप हमारे रिश्तेदार आज बने है और जिन्हें आप असभ्य जंगली कह रहे है उनके पूर्वज महाराज चन्द्र के समय से ही हमारे सहयोगी है, आज चन्द्र वंश जो कुछ भी आपको दिख रहा है इनकी वीरता, स्वामिभक्ति और हमारे प्रति इनके समर्पण का परिणाम है”

क्रोध में तो आल्हा, मलिखे और सुलिखे भी थे परन्तु वो राजा परिमल के सम्मान में शांत थे | मलिखे सोंच रहा था की अगर एक बार राजा परिमल कह दे तो वो माहिल को उठा कर किले की सबसे ऊँची बुर्ज से नीचे फेक दे,हमेशा हमेशा के लिये माहिल की कहानी ही ख़त्म कर दे या फिर एक बार माहिल अकेला दरवार के बाहर मिल जायें तो उसके दोनों पैरो में भारी पत्थर बाँध कर कीरत सागर तालाब में फेक आये जहाँ माहिल सड सड कर मर जायें क्योकि इतने गंदे आदमी को मछलियाँ तो खाने से रही |

“क्षमा करे महराज, मै क्रोध में कुछ ज्यादा बोल गया” माहिल ने पैतरा बदलते हुये हाँथ जोड़ कर कहाँ |

राजा परिमल ने गहरी साँस ली फिर शांत हो कर पूछां “आप अपना उलहना सुनाइये, आपको क्रोध क्यों आया ? ऐसा क्या हो गया ?”

“महराज उदय बनाफर उरई आया था वहाँ कुयें पर कुछ पनहारिनो से असभ्य आचरण किया, पनहारिनो के समझाने पर उसने उनके बर्तन फोड़ डाले, कुयें के सामने ही राजकीय उद्यान है वहाँ से मालियों ने आकर उदय को समझाया की नारियो का सम्मान करना सीखे तो उदय ने उन मालियों को भी मारा और उद्यान भी तहस नहस कर डाला, डरे हुयें माली राजकुमार अभई सिंह से मिले तो राजकुमार ने भी उदय को वहाँ जा कर समझाया की तुम तो मेरे भाई जैसे हो, हम राज परिवार बालो को तो स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिये लेकिन उद्दंड उदय ने अभई को भी मारा और उसका हाँथ तोड़ दिया, अंत में जब मुझे पता चला तो मैंने भी जाकर समझाया और धमकी भी दी की तुम्हारी शिकायत मै तुम्हारे राजा से करूंगा तब जा कर बड़ी मुश्किल से उदय उरई से वापस गया, इसे कामातुर जवान को संभालिये महाराज नही तो यह किसी दिन चंदेल वंश की नाक कटवायेगा” माहिल ने नमक मिर्च लगा कर ऊदल की शिकायत कर दी |

“असंभव ! असंभव राजा माहिल, उदय स्त्रियों से असभ्य आचरण नही कर सकता, वह स्त्रियों का सम्मान करना जानता है, मै उसका केवल नाम का चाचा नही हूँ, मै उसका गुरु भी हूँ, उसके स्वाभाव से अच्छी तरह से परिचित हूँ” ताला सैय्यद अपने स्थान से गरज उठे |

“बनारस के सरदार सैय्यद, आप इन बनाफरो की फितरत नही जानते, ये असभ्य जंगली .......” माहिल कुछ आगे बोल पाता की सैय्यद बीच में ही फिर बोले “मै बनारस का हूँ या कलकत्ता का कोई फर्क नही पड़ता लेकिन मै उदय की एक एक आदत से परिचित हूँ, वह जोशीला है, वीर है, साहसी है, योद्धा है, वह देवि चन्द्रिका का भक्त कभी स्त्रियों से असभ्य आचरण नही कर सकता, निश्चित ही उन स्त्रियों ने कुछ गलत किया होगा”

“महराज आप कुछ कहिये, मेरे पुत्र का हाँथ टूट गया, मै न्याय की आश लिये आपके पास आया हूँ, आप ही न्याय करिये”

“न्याय साक्ष्य, सत्यता पर आधारित होता है राजा माहिल जिसे केवल एक पक्ष को सुन कर नही किया जा सकता मै उदय सिंह का पक्ष भी सुनूँगा, यदि उदय सिंह अपराधी सिद्ध होता है तो उसे दंड भी मिलेगा परन्तु राजा माहिल आप यह बताये की जब मैंने भरी सभा में सबसे मन किया था की दक्षराज और बक्षराज की मृत्यु की घटना की चर्चा कभी भी किसी से नही की जायेगी तो आपने उदय सिंह से इस बारे में चर्चा क्यों की ? क्या यह राजज्ञा का उलंघन नही है? क्यों न आपको इसके लिये दोषी माना जाये ?” राजा परिमल ने माहिल से पूछा

“महराज यह घटना तो बच्चा बच्चा जानता है मै कोई पहला ब्यक्ति नही हूँ जो यह बता रहा है, उदय उदंडता कर रहा था तो उसे रोकने के लिये बोल दिया” माहिल ने सिर झुका कर कहा

“आपने उसे बताया नही वल्कि उदय को ताना मार कर उसे बदला लेने के लिये प्रेरित किया है, आपने यह भी नही सोंचा की उदय तो अभी बच्चा है जिसे जोश तो है लेकिन अनुभव नही है, कही जोश में कुछ गलत कर बैठे तो? जैसे तैसे हम पुराने घावों से उबार पायें है, आप हमारे प्रधान सलाहकार हो कर भी हमारे विरुद्ध कार्य कर रहे है?” राजा परिमल ने कहा

“महराज, मैंने जो कुछ भी कहा था असत्य नही था फिर मेरे इकलौते पुत्र का उदय ने हाँथ तोडा तो मै क्रोध के वशीभूत बोल गया, परन्तु मेरी नीयत आपको क्षति पहुचाना नही था” माहिल ने कहा

“प्रधान मंत्री जी ! क्या आपको लगता है की उकसा कर महुबे को युद्ध में झोक देने से महराज को क्षति नही पहुचेगी ?” कुल पुरोहित चिंतामणि ने पूछा

माहिल एकदम से शर्मिंदा हुआ परन्तु संभल कर फिर कुटिलता से बोला “ठीक है महराज, मै उरई का राजा, आपका प्रधान मंत्री और साथ ही आपका सगा रिश्तेदार भी, अपने पुत्र के हाँथ तोड़े जाने की और राजकीय उद्यान उजाड़े जाने की शिकायत यह सोंच कर आपसे कर रहा था की आप उदंड हो रहे बनाफरो को आप दंड देकर उन्हें सही राह बतायेगे लेकिन यहाँ आप और आप के राज दरवारी सब मुझ पर ही उल्टा आरोप लगा रहे है, तो मेरी आपसे आस ही ब्यर्थ है ...........चलता हूँ महाराज
............जय राम जी की” बोल कर माहिल दरवार से बाहर आ गया |

“मक्कार .......... चुगलखोर” राजा परिमल बहुत धीरे से बोले |

क्रमशः
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AUTHOR, MOTIVATOR, TRAINER, BLOGGER
is famous for his unpublished Novel "AARYAN - EK ALOKIK YOUDHA(आर्यन - एक अलौकिक योद्धा)". Mostly authors known for his English Novels but he is standing in the same lobby for his Hindi novels. Currently his Novel "KAUN JEETA AUR KYU (कौन जीता और क्यों)" is available on all e-commerce websites and leading Bookstores. it is another step of success and he enjoying its bestselling. his another Book is also ready to publish name "PARO KE DIYE (पारो के दीये)" and will be available in 2017.

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