_____ सत्य मेरा चिर हो, न हो | मधु सा रस हो, जीवन के लिए || शिव अपने सा संकल्प मुझे दो | लक्ष्य सधे, कर्म हो अर्पण के लिए _____ _________________________________________________Ambika Sharma__________________________________________________

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Saturday, 13 May 2017

चंद्रोदय - 1

भाग-(2)
(गतांक से आगे )

पहला माली अब धीरे धीरे उठा, थप्पड़ की चोट ज्यादा गहरी थी क्योकि माली का एक हाँथ अभी भी उसके गाल पर था, स्वर शांत था लेकिन घुड़सवार शांत नही था उसने गुस्से भरे स्वर में माली से पूंछा “तुम्हारे राजा ने तुम लोगो को अतिथि से परिचय लेने के बाद उसका उचित सत्कार करना नही सिखाया ? इस गाँव का हर ब्यक्ति असभ्य है .......... दंड मिलेगा .......अवश्य मिलेगा”  इतना बोल कर घुड़सवार ने अपने घोड़े की ओर देखा, फिर आवाज दी “बेन्दुला”

घोडा बेन्दुला अपने दोनों पैर आगे कर नाचता हुआ सा घुड़सवार के पास आ गया, काले भूरे रंग का, अच्छी नस्ल का, ऊँची कद काठी का, दमदार घोडा, उसके भाव से ही झलक रहा था की वह अपने मालिक की भाषा इशारे में समझता है, घुडसवार ने ने घोड़े की पीठ पर हाँथ फेरा, फिर कुछ इशारा किया, बेन्दुला बगीचे की ओर दौड़ गया, पूरे बाग़ में दौड़ दौड़ कर बाग़ उजाड़ने लगा |

इसी समय घुड़सवार के हम उम्र नौजवान लडके ने बाग में प्रवेश किया, नौजवान के राजसी वस्त्र, गले में कीमती मालायें, स्वर्ण आभूषण आदि के पहनावे से स्पष्ट था की या तो यह राज परिवार का ही ब्यक्ति है अथवा कोई राजकुमार है, उसका चेहरा क्रोध से लाल था, आँखे तमतमाई हुई, भौहें तनी हुई,उसने अपने दाहिने हाँथ में तलवार ले रखी थी जो की प्रहार मुद्रा में ऊपर उठी हुई थी | इस नवयुवक को देख कर माली का चेहरा खिल उठा, उसे लगा जैसे उसका रखवाला आ गया हो |

“युवराज अभई सिंह की जय” माली ने अपने दोनों हाँथ जोड़ कर  जोर से कहा

युवराज ने अपने बायें हाँथ को ऊपर उठा कर उसके अभिवादन का उत्तर दिया, और पूंछा

“कौन है वो दुष्ट ? जिसने बाग उजाड़ा और तुम्हे मारा ?”
माली ने हाँथ से घुड़सवार की ओर इशारा किया |

“ दुष्ट, जंगली ! तेरी मृत्यु तुझे यहाँ तक ले आई है” अभई सिंह ने घुड़सवार की ओर देखते हुये कहा और उसे तलवार उठा कर मारने के लिये उसकी ओर दौड़ा,

युवराज को नजदीक आतें देख घुड़सवार चपलता के साथ झुका और अपने दोनों हांथो से अभई की कमर पकड़ कर, उसे हवा में ऊपर उठा कर. अपने सिर के ऊपर से अपने पीछे उछल दिया, अभई तलवार का प्रयोग नही कर पाया, अभई को इस फुर्ती का अनुमान भी नही था वह हवा में उछल कर अपने दाहिने हाँथ के बल, धरती पर गिर पड़ा, तलवार भी हाँथ से छिटक कर दूर जा गिरी, अभई उठ न सका, कमर पर गहरी चोट आई, और दाहिना हाँथ टूट चुका था |

“यह कैसा नगर है ? यहाँ हर स्त्री, पुरुष या तो बातों से चोट करता है या फिर हाथों से, आगंतुक का परिचय कोई जानना ही नही चाहता,कौन है? क्यों आया है ? उसकी क्या समस्या है ? किसी को कोई लेना देना ही नही, मानवता है यहाँ की नही ? जाने कौन है यहाँ का राजा जो ऐसी प्रजा है ?” घुडसवार ने माली से पूंछा

“श्री मान जी ! आप कौन है ? कहाँ से आये है? इस नगर में आपको किससे क्या काम है ? हाँथ जोड़े माली ने घुड़सवार से सिर झुका कर पूंछा

“हाँ, यह पहला सही प्रश्न है जो इस नगर में मुझसे किसी ने पूंछा, बिना शक्ल विगडे अक्ल नही आती तुम लोगो को ? घुड़सवार ने मुस्कुरातें हुये पूछां |

माली नज़रे नीची किये खड़ा था, विन्रमता से उसके हाँथ जुड़े थे |

“राज माली, मै हूँ उदय सिंह, गढ़ महुबे से आया हूँ, सब मुझे ऊदल के नाम से जानते है, मुझे यहाँ किसी से कोई काम नही है, मै यहाँ राह भटक कर धोखे से आ गया हूँ, मै और मेरा घोडा दोनों भूखे और प्यासे है तो पानी की तलाश में वहाँ कुयें पर गया तो वो वाचाल स्त्रियों ने पानी तक नही दिया पीने को, घोडा धोखें से यहाँ बाग में आ गया तो तुम क्रोध दिखाने लगे, पता नही क्या संस्कार है यहाँ के निवासियों में ? पता नही, कैसा है तुम्हारा राजा ?” घुड़सवार ऊदल ने माली को बताया |

“मै हूँ, यहाँ का राजा माहिल” ऊदल के पीछे से आवाज सुनाई दी, ऊदल ने पीछे मुड कर देखा राजा महिल अपने कुछ सैनिको के साथ खडें थे, छोटा कद गोरा रंग कुछ कीमती आभूषण पहने एक रेशमी दुशाला ओठे, राजा माहिल भी क्रोध में ही लग रहे थे|



“प्रणाम  मामा जी” ऊदल ने शिष्टता पूर्वक अभिवादन किया

“प्रणाम प्रणाम, उदय यह कैसी धृष्टता है ? क्या तुम नही जानते यह मेरी अर्थात राजा माहिल की नगरी उरई है ?” माहिल ने क्रोध भरे स्वर में पूछा
“नही मामा, मुझे जानकारी नही थी अन्यथा मै यहाँ पनहारिनो से पानी माँगने के बजाह राजमहल जा कर अतिथियों की अपना स्वागत करवाता” उदय ने हंस कर कहा

“स्वागत और बनाफारो का ? तुमने यह सब कुछ जानबूझ कर किया है उदय, हो तो बनाफर ही जंगलियो सा असभ्य ब्यवहार ही तुमने किया है, पूरा राजकीय उद्यान तुमने उजाड़ दिया” माहिल क्रोध में बोला

“और मेरा हाँथ भी तोड़ दिया” कराहते हुये अभई ने अपना हाँथ दिखाते हुये कहा

“मामा जी, शुरुवात मैंने नही की, और आप अपनी भाषा पर नियंत्रण रखे आप बार बार मेरा अपमान कर रहे है” उदय अपने क्रोध को दबाते हुये बोला

“बनाफरो का मान क्या? अपमान क्या ?” माहिल हसँते हुये बोला

“मामा जी, शांत हो जाइये , वर्ना आप बहुत अच्छी तरह जानते है की अगर मै अपनी पर आ जाँऊ तो आप और आप की पूरी सेना मिल कर भी मेरा कुछ नही विगाड  सकती, और मै अकेले ही आपकी पूरी उरई को तहस नहस कर सकता हूँ” उदय क्रोध से लाल हो गया |

“इतने बड़े योद्धा हो तो जा कर माडौगढ़ में अपने बाप की हत्या का बदला क्यों नही लेते, जहाँ तुम्हारे बाप खोपड़ी आज भी पेड़ पर टंगी है” माहिल कुटिलता पूर्वक बोला |

“मामा माहिल ????” उदय पूरी ताकत से चीखा

उदय का चेहरा क्रोध से तनतमा गया, मुठ्ठी भीच गई, आँखे लाल हो गई, ओठ फड़कने लगे, एक एक रोया खड़ा हो गया, ऊदल ने खुद को नियंत्रित किया फिर बोला “ये आप क्या कह रहे है ?”

“मै क्या कह रहा हूँ पूरा संसार जानता है, माड़ोगढ़ के करिंगा ने सोते हुये तुम्हारे बाप की हत्या कर दी थी, तुम्हारे बाप की लाश को कोल्हू में पीस डाला था, खोपड़ी आज भी माड़ोगढ़ के किले के बाहर पेड़ में टंगी है, महुबे में कोई सूरमा नहीं था जो उसका बदला लेता, सब दुम दवा कर बैठे रहे” 

महिल ने चिंगारी सुलगा दी |

ऊदल क्रोध में तमतमा रहा था |

“बेन्दुला” उदय ने आवाज दी

घोडा उदय के पास आ गया, उदय उस पर चुप चाप बैठ गया |

“जाओ उदय, जाओ जो अपने बाप का बदला न ले सके ऐसे लडके पर धिक्कार है” माहिल ने जाते जाते उदय पर फिर ताना मारा |


भूखा प्यासा ऊदल चुप चाप वापस चल दिया |


क्रमशः
copyright@Ambika Sharma

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AUTHOR, MOTIVATOR, TRAINER, BLOGGER
is famous for his unpublished Novel "AARYAN - EK ALOKIK YOUDHA(आर्यन - एक अलौकिक योद्धा)". Mostly authors known for his English Novels but he is standing in the same lobby for his Hindi novels. Currently his Novel "KAUN JEETA AUR KYU (कौन जीता और क्यों)" is available on all e-commerce websites and leading Bookstores. it is another step of success and he enjoying its bestselling. his another Book is also ready to publish name "PARO KE DIYE (पारो के दीये)" and will be available in 2017.

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