भाग-(1)
(गतांक से आगे )
गढ़ महुबे (वर्तमान महोबा) में राजा परिमाल का दरवार सजा था
| पत्थरों पर उकेरी शानदार नक्कासी से बना राजमहल जिसका विस्तार पूर्व वर्ती राजा
कीर्ति वर्मन ने करवा कर राजमहल को भव्य बनवाया था | एक बहुत बड़े से कक्ष में जिसमे
चारो ओर पत्थर की बनी कला कृतियाँ रेशमी परदे मखमली कालीन के एक ओर उचाई में राजा
परिमाल का सिंघासन जिसमे सोने चाँदी से सजावट की गई थी | सिंघासन के दोनों
ओर क्रम से सजावटी सिंघासन रखे थे जिन पर राज गुरु चिंतामणि, सेनापति जगन्नायक, सरदार तालासैय्यद ,प्रमुख सामंत आल्हा , मलिखान , सुलिखान, युवराज ब्रम्हा ,सहित
प्रमुख दरवारी ढेवा,तालन आदि विराजमान थे | दरवार के उपरी हिस्से को झरोखों के रूप
में रेशमी पर्दो से सजाया गया था जहां राज्य की प्रमुख महिलायें बैठती थी | कक्ष
के चारो ओर पानी गिराती मूर्तियाँ थी जिनसे पानी फव्वारे के रूप में निकालता था,
कक्ष में बड़े बड़े झरोखे बनाये गये थे ताकि हवा का आवागमन होता रहे फव्वारों का
पानी और झरोखों की हवा कक्ष को शीतल करती थी| कक्ष के ऊपरी छत में , बड़े बड़े रेशमी
पंखे लगे थे जिन्हें कर्मचारी निरंतर चलते थे | इनमे विशेष इतर का प्रयोग किया
जाता था ताकि सुगन्धित हवा पूरे दरवार में रहे | शानदार ब्यबस्था के साथ राजा
परिमाल का दरवार चल रहा था |
ऊदल ने बहुत
धीमी चाल के साथ दरवार में प्रवेश किया, बिखरे बाल, मलीन मुख पर उदासी, आँखे लाल,
गर्दन झुकाये सिर नीचा किये ऊदल सबको पार करता हुआ सीधे राजा परिमाल के पास पंहुचा
और पैरो के पास बैठ गया |
राजा परिमाल को लगा कोई बड़ी दुर्घटना का संकेत है यह ऊदल का
रूप उन्होंने सहमते हुये पूछां “उदय सिंह सब कुशल तो है? यह मुख मंडल मलीन क्यों
है ? कोई शत्रु कुशल हो गया क्या ?”
“आपके आशीर्वाद से, गुरु गोरक्ष नाथ और माँ चन्द्रिका की
कृपा से मेरा कोई भी शत्रु कभी भी कुशल नही रह सकता परन्तु जब मेरे अपनर सगे ही
मेरे शत्रु की मुझसे रक्षा करे तो मेरा मुख ही क्या पूरा शरीर ही मलीन हो जायेगा
महराज” उदय ने धीरे स्वर में दुःख प्रगट करते हुये कहा-
“ऊदल! महाराज हमारे पिता तुल्य भगवान् है उनसे बात करने का
यह तरीका गलत है” आल्हा ऊदल के बड़े भाई ने टोंका
“हां दद्दा मै जानता हूँ, मै यहाँ गलत हूँ लेकिन आप ही
बताओ, आप लोगो ने जो मुझसे इतनी बड़ी बात छिपाई है क्या यह गलत नही है ?” ऊदल लगभग
रोते हुये बोला
“तुमसे ऐसा क्या छिपा लिया हम लोगों ने उदय सिंह ?” राजा
परिमाल ने हंस कर पूछा
“यही की मेरे पिता, और आपके प्रमुख सरदार की सोते समय
ह्त्या कर दी गई थी और उनका हत्यारा आज भी निर्भय और प्रसन्न घूम रहा है” ऊदल का
बोलते बोलते गला रुंध गया | वह जहाँ खड़ा था वही घुटनों के बल बैठ गया, उसने अपने
सर की पगड़ी उतारी जमीन पर रख दी, अपने दोनों हांथो से अपने सर के बाल खीचते हुये
बोला
“हम किस बात के क्षत्रीय है दद्दा ? हमारे बाप को बेरहमी से
मार डाला गया और हम सब भूले बैठे है ? हमारा बाप क्या अनाथ था जो उसे मारने बाला
हत्यारा मौज में है ? क्या हम सब नपुंसक है जो लोगो के ताने सुने और रेशमी चादर ओढ़
कर सोते रहे ?”
इतना सुनते ही पूरे दरवार में सन्नाटा छा गया, आल्हा,
मलिखे, और सुलिखे तीनो अपने स्थान पर खड़े हो गये, आल्हा की आँखे क्रोध से लाल हो
उठी मुठ्ठियाँ मिंच गई मूंछ के बाल कड़े हो गये, फड़कते ओठो से गुस्से में आल्हा
चीखा “किसने कहा तुमसे ये सब ?”
“किसने कहाँ या क्यों कहा इसका महत्व नही है दद्दा, महत्व
तो इस बात का है की आप सब ने इतनी बड़ी बात मुझसे छिपाई” ऊदल की आँखों से लगातार
आंसू बह रहे थे, सिर नीचे किये वह लगातार रो रहा था |
“यह सब झूठ है उदय सिंह, तुम्हारे पिता एक महान योद्धा थे,
जो रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुये थे, वो स्वयं तो नही रहे थे लेकिन मरते मरते
उन्होंने हमें वह युद्ध जिता दिया था उनके पराक्रम से गढ़ महुबे ने कई युद्ध जीते
है तुम्हे तो अपने यशस्वी पिता पर गर्व होना चाहिये |” राजा परिमल ने ऊदल को
समझाया
“आप सच कह रहे है?” ऊदल ने गर्दन ऊपर करके पूंछा
“अपने पिता तुल्य महाराज पर संदेह कर रहे हो ऊदल ?” आल्हा
ने ऊदल से पूंछा |
ऊदल कुछ नही बोला बीएस गर्दन झुकाये बैठा रहा, दरवार में
अभी भी शान्ति छाई थी आल्हा ने फिर पूंछा “ऐसी मनगढ़ंत कहानिया तुम्हे सुनाता कौन
है? किसने क्या कह दिया ? मुझे बताओ मै उसका मुंह हमेशा के लिये शांत कर दूँ|”
“उरई के मामा माहिल कह रहे थे की धिक्कार है हमारी जवानी
पर, योद्धा बने फिरते हो तो जाओ माड़ोगढ़, अपने बाप का बदला क्यों नही लेते, मदोगढ़
के कलिंगा ने हमारे पिता और चाचा की सोते हुये ह्त्या कर दी थी” ऊदल गर्दन झुकाए
हुये बोला
“माहिल ???” राजा परिमल धीरे से आश्चर्य चकित हो बोले-
ऊदल ने स्वीकृति में सिर हिलाया |
“उदय सिंह तुम एक समझदार योद्धा हो, कहाँ एक झूठे, मक्कार
चुगलखोर की बातों में आ गये” राजा परिमल ने फिर कहा-
ऊदल अब संतुष्ट था |
“आओ उदय सिंह अपना स्थान ग्रहण करो” टला सैय्यद ने स्नेह के
साथ ऊदल को बुलाया
ऊदल खड़ा हो गया फिर मुस्कुरा कर बोला “नही चाचा, अब मै घर
जा कर विश्राम करूँगा, मैंने कल से खाना पीना सब छोड़ रखा है अब जा कर शांति मिली
है तो भोजन आदि लेकर विश्राम करूँगा, हाँ मामा माहिल को दंड अवश्य दूँगा जब भी
मुलाक़ात होगी”
“नही ऊदल तुम कुछ भी नही कहोगे, मामा माहिल, महराज के सगे
है उनसे बात स्वयं महराज करेंगे” आल्हा ने रोका
“ जी” ऊदल ने कहाँ
“जी, नही बचन दो, अब तुम मामा जी से इस बारे में कोई बात
नही करोगे” आल्हा ने जोर दे कर कहाँ
“जी वचन दिया” कह कर ऊदल सब को सम्मान पूर्वक अभिवादन करते
हुये दरबार से चल दिया |
ऊदल के जाने के बाद राजा परिमल अपने सिर पर हाँथ रखते हुये
बोले-
“माहिल कितना चुगलखोर है रे तू” |
क्रमशः
copyright@Ambika Sharma
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