(गतांक से आगे )
(भाग-1)
दक्षराज और बक्षराज दोनों देवि उपासक थे जो नित्य संध्या वंदना अवश्य करते थे, गंगा घाट की पावन भूमि पर भी दक्षराज और बक्षराज दोनों कुछ सैनिको को साथ ले एकांत सूनसान स्थान पर संध्या वंदना के लिये शाम के समय चले गये |
माहिल ने यही समय
ही उचित समझा और करिंघा तक खबर पहुंचा दी और खुद डेरे से दूर भाग गया |
करिंघा अपनी मौसी
से मिलने महुबे के डेरे पर आ गया, पहरेदारो ने परिचय जान कर करिंघा को रानी मल्हना
तक पहुचा दिया |
“चरण स्पर्श मौसी,” करिंघा ने मल्हना के पैर छूते हुये कहा
“आशीर्वाद” मल्हना ने पहचानते हुये आशीर्वाद दिया
“मुझे तो आप ही खुश कर सकती हो मौसी” करिंघा ने कहा
“वो कैसे ?” मल्हना ने पूंछा
“मुझे, अपना नौलखा हार दे कर” करिंघा जानता था की बनाफर
सरदार कभी भी आ सकते है इसलिये सीधे विषय पर आ गया |
“नौलखा हार ????? तुम क्या करोगे उसका ?” मल्हना ने आश्चर्य
से पूंछा
“मौसी, बेकार के प्रश्न ना पूंछो, अपना नौलखा हार मुझे दे
दो बस” करिंघा क्रोधित सा होने लगा
“पागल हो गये हो क्या ? अपने पूर्वजो का हार मै तुम्हे
क्यों दे दू ?” मल्हना ने भी क्रोधित होते हुये पूंछा
“ख़ुशी ख़ुशी दे दो, नही तो तलवार के बल तो मै ले ही लूँगा”
करिंघा अपनी तलवार निकालते हुये बोला
रानी मल्हना ने ताली बजा कर द्वार पर खड़े सैनिको को बुला
लिया, खुद भी अपनी कटार निकाल ली, करिंघा ने आये हुये सैनिको पर वार करना शुरू कर
दिया, सैनिक करिंघा की फुर्ती का सामना नही कर पा रहे थे, घायल होते जा रहे थे|
खटक खटक की आवाजे, घायल सैनिको की कराहने की आवाजे, महिलाओं का भय से चीखने की
आवाजे और करिंघा का गर्जन स्वर साफ़ साफ़ दूर दूर तक सुनाई देने लगा |
यह आवाज
ताला सैय्यद तक भी गई, उसे लगा शायद कही युद्ध होने लगा, शोर सुन कर जानने की
जिज्ञासा हुई, ध्यान से सुनने पर ताला सैय्यद समझ गया की आवाजे गढ़ महुबे के डेरे
से आ रही है |
“बचाओ बचाओ” का शोर महिलाओं का ताला सैय्यद ने साफ़ साफ़ सुना
“ओह्ह तो कोई स्त्रियों को लूट रहा है” सोचते ही ताला
सैय्यद महुबे के डेरे की ओर भागे |
जैसे ही ताला सैय्यद वहाँ पहुचे उन्होंने देखा की चारो ओर
घायल सैनिक कराह रहे है और करिंघा रानी मल्हना से छीना झपटी कर रहा है |
“ठहर ठहर ! दुष्ट, ये गंगाघाट के पवित्र स्थान है यहाँ तू
एक स्त्री का अपमान करने का दु साहस कर रहा है” बोलते हुये ताला सैय्यद करिंघा की
ओर बढ़ गया |
करिंघा ने भी मल्हना को छोड़ा ओर सैय्यद की ओर लपका “खटाक
खटाक” दोनों की तलवारे आपस में भिड़ी, बिजली सी चिंगारी फूटी, गजब की फुर्ती दिखाई
ताला सैय्यद ने, दोनों की तलवारे भिड़ी हुई थी की सैय्यद ने पैतरा बदलते हुये उछल
कर एक पैर से जोर दार प्रहार किया करिंघा की छाती पर, करिंघा उछल कर दूर जा गिरा
उसकी तलवार भी हाँथ से छूट गई, करिंघा जैसे तैसे संभला और भाग खड़ा हुआ |
“आप ठीक है ना ?” ताला सैय्यद ने रानी मल्हना से पूंछा |
“हां मै ठीक हूँ, परन्तु आप कौन है? जिन्होंने ने मेरी
जरुरत पर मदद की” मल्हना ने पूंछा
“मै बनारस का सरदार ताला सैय्यद हूँ” अपना परिचय देते हुये
सैय्यद ने बताया |
थोड़ी ही देर में महुबे के डेरे के बाहर भीड़ लग गई, दक्षराज
और बक्षराज भी संध्या वंदना से वापस आ गये, भीड़ और घायल सैनिक देख कर सब समझ गये
फिर सैनिको से उन्हें पता चल गया की करिंघा नौलखा हार लूटने की नीयत से रानी मल्हना के पास आया था लेकिन ताला सैय्यद के
लिये कारण सफल नही हो पाया |
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