_____ सत्य मेरा चिर हो, न हो | मधु सा रस हो, जीवन के लिए || शिव अपने सा संकल्प मुझे दो | लक्ष्य सधे, कर्म हो अर्पण के लिए _____ _________________________________________________Ambika Sharma__________________________________________________

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Friday, 1 September 2017

चंद्रोदय - 12

21:35:00
(गतांक से आगे )
(भाग-3)

“क्या हुआ मेरी बहन को? उस दुष्ट करिंघा की इतनी हिम्मत ? मै अभी उस पापी की मुस्के बाँध कर लाता हूँ” ठीक इसी समय माहिल वहाँ आया, आते ही चिल्लाने लगा|

“शांत हो जाओ भैया, यहाँ सब ठीक है” रानी ने समझाते हुये, माहिल से कहा फिर सैय्यद की ओर देख कर रानी बोली “इनसे मिलो भैया, ये है बनारस के सरदार ताला सैय्यद, जिनके कारण मै सुरक्षित हूँ”|

“अरे ! मै आपका बहुत ऋणी हूँ, आपने हमें घोर कलंक से बचा लिया” माहिल हाँथ जोड़ कर सैय्यद के सामने खडा हो गया थोडा रुक कर दक्षराज, बक्षराज की ओर देख कर बोला|

“आप लोग कहाँ चले गये थे ? मेरी बहन को अकेला छोड़ कर, अगर कुछ उच्च नीच हो जाती तो मै क्या मुँह दिखाता महाराज को, कोई जिम्मेदारी है आपकी या नही ?”
“राजा माहिल, आपकाइर भी तो आगमन भी इसी उद्देश्य से हुआ था की हम बनाफर जंगली अगर महारानी की रक्षा ना कर पाए तो आप करेंगे फिर भी आप महारानी को अकेला छोड़ कर चले गये जबकि आपको तो पता ही है की शाम के समय हम दोनों भाई नित्य संध्या वंदना के लिये जाते है” बक्षराज ने कटाक्ष किया|

मल्हना मुस्कुरा दी, लेकिन बात संभालते हुये बोली “वो सब छोडिये, आप सब विश्राम कीजिये, सुबह भोर में हमें यहाँ से प्रस्थान करना है”|
सब सिर झुका कर वहाँ से चले गये, दक्षराज और बक्षराज घायल सैनिको के उपचार में लग गये |

लेकिन राजा माहिल की योजना असफल हो गई थी, मन में क्रोध भरे हुये वो सीधा करिंघा के पास पंहुचा |

“क्या मामा, आप मुझसे कोई पुरानी दुश्मनी निभा रहे है क्या ?” करिंघा भी क्रोध में था|

“मैंने क्या दुश्मनी निभाई ? बड़े योद्धा बने फिरते हो, एक योद्धा से भी युद्ध नही जीत सकें” माहिल भी गुस्से में बोला|

“एक योद्धा ? अरे वो योद्धा नही है, वो कोई महारथी है और आप कह रहे थे की वहाँ कोई योद्धा नही होगा” करिंघा दुखी हो कर बोला|

“हाँ, जाने कहाँ से आ गया कोई बनारस का सरदार है नासपीटा” माहिल खीझ भरे स्वर में बोला|

“क्या मामा मेरी तो राजपूती में कलंक लग गया ..............जाने दीजिये फिर कभी बदला तो लूँगा ही अपनी इस बेइज्जती का” करिंघा दुखी था|

“फिर कभी देखने बालो को सिर्फ उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने बाले छोड़ दिया करते है इसलिये अब तुम मेरी योजना सुनो, कल सुबह भोर में महुबे का लश्कर यहाँ से चल देगा महुबे के लिये, तुम भी उस लश्कर का पीछा करो कही ना कही तो लश्कर रात्री विश्राम करेगा ही, बस तुम रात्री में लश्कर पर आक्रमण कर देना, असावधान, थके हारे सैनिक सो रहे होंगे, तुम और तुम्हारे सैनिक आराम से लूट करवाँ लोगे” माहिल ने योजना समझाई|

करिंघा ने पूरी योजना सुनने के बाद कहा “हाँ ठीक है मामा जी लेकिन इस बार मै किसी को छोड़ूगा नही, आप अपना सोंच लीजिये कहाँ छिपेंगे ?”

“मै कही ना कही छिप जाऊँगा लेकिन इन बनाफरो को बिलकुल मत छोड़ना भले ही महुबे तक ही पीछा करना पड़े, हाँ आक्रमण रात में ही करना, दिन में उनसे जीत नही पाओगे” महिल खुश हो कर बोला|

“ठीक है” करिंघा भी मुस्कुरा दिया|

“ठीक है, अब मै चलता हूँ, अब मेरी तुम्हारी मुलाक़ात यहाँ नही हो पायेगी” महिल बोला और विदा लेकर महुबे के लश्कर में शामिल हो गया | 


क्रमशः
copyright@Ambika Sharma



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Wednesday, 23 August 2017

चंद्रोदय - 11

20:41:00
(गतांक से आगे )
(भाग-2)

रानी मल्हना के सामने गुलाबी रंगत का गोरा चिट्टा, बढी हुई दाढ़ी,कसा हुआ शरीर, बहुत अच्छी लम्बाई का, ख़ूबसूरत नवजवान खड़ा हुआ था, दोनों समझ गये यही ताला सैय्यद है |

“आप भी यहाँ गंगा स्नान के लिये आये हुये है?” मल्हना ने सैय्यद से पूंछा 
 
“हाँ, यही समझ लीजिये, जा तो रहा था कनवज लेकिन सुना की यहाँ दसहरा मेला लगा है तो मेला देखने यही रुक गया” सैय्यद ने बताया|

“कनवज ? कोई विशेष काम था या यूं ही घूमने या फिर राजा का कोई सन्देश ?” मल्हना ने पूंछा

“नही, बस नौकरी की तलाश में” सैय्यद ने बताया|

“नौकरी ? क्या कनवज में ही जरूरी है ? नही तो हमारे साथ महुबे चलिये, महुबे के सरदार बनिये”

मल्हना ने प्रस्ताव दिया|

सैय्यद सोंच विचार में पड़ गया |

“सोचो मत वीर योद्धा, आप वीर है, साहसी है, न्याय के लिये, स्त्री के स्वाभिमान के लिये, आप विना जान पहचान के लड़ सकते है, ऐसे योद्धा का सम्मान सभी जगह होता है, मै गढ़ महुबे की महारानी मल्हना हूँ यदि आप सहमत हो तो मै आप को महुबे के राजपुत्रो की अच्छी शिक्षा के लिये उनका गुरु नियुक्त करती हूँ आप उन्हें युद्ध विद्या की शिक्षा दीजिये” मल्हना ने अपना प्रस्ताव पूरा किया|
ताला सैय्यद ने सहमति में सर हिला दिया |

“महारानी, आप कुशल तो है ना ?” दक्षराज ने आगे बढ़ कर पूंछा|

“हाँ, सरदार, इस साहसी योद्धा के कारण मै कुशल हूँ” रानी मल्हना ने मुस्कुरा कर कहा|

“आपका बहुत बहुत धन्याबाद आभार वीर योद्धा” कहकर दक्षराज ने आगे बढ कर सैय्यद को गले लगा लिया|

“गढ़ महुबा आपका आभारी है, हमारी मित्रता स्वीकार करे मान्यवर” बक्षराज भी गले लग गया|

“मेरा सौभाग्य है, आपका यह सम्मान” कह कर ताला सैय्यद ने दोनों को बाहे फैला कर गले लगा लिया|

“मुसलमान हो कर हिंदी का इतना ज्ञान ?” मल्हना ने  आश्चर्य से पूंछा|

“महारानी, जन्म से मुसलमान जरूर हूँ परन्तु मेरी शिक्षा, लालन पोषण सब विद्वानों की नगरी वाराणसी में हुआ है, संस्कार भी मुझे हिन्दू विद्वानों से प्राप्त हुये है, यही कारण है की मुझे हिन्दू मान्यताओं का भी ज्ञान है और मुस्लिम परम्पराओं का भी, मै आपके साथ गढ़ महुबे चल रहा हूँ आपका नमक खाऊँगा मुसल्ल ईमान है मेरा, वचन देता हूँ, नमक का हक अदा करूँगा मर जाऊँगा लेकिन कभी भी महराज का भरोषा नही मिटने दूँगा, मेरा वचन ही मेरा ईमान है, मेरा दीन धर्म है” ताला सैय्यद ने दाहिना हाँथ ऊपर उठा कर कहा|

“हमें आप पर पूरा भरोषा है मित्र” बक्षराज ने हाँथ पकड़ते हुये कहा|

“ताला सैय्यद नाम है मेरा, आप मुझे सैय्यद कहे सरदार” ताला सैय्यद ने बक्षराज के कंधे पर हाँथ रख कर कहा |

दक्षराज, बक्षराज और रानी मल्हना तीनो मुस्कुरा दिये |

दक्षराज और बक्षराज का ध्यान अपने सैनिको पर गया जो दर्द से कराह रहे थे, दक्षराज उनकी चोटों पर लेप लगवाने लगा, बक्षराज ने रानी से पूंछा “रानी आप मुझे आदेश दीजिये मै अभी उस दुष्ट करिंघा की नाक में नकेल डाल कर, पालतू जानवर की तरह आपके सामने खड़ा कर दूँ”

“नहीं सरदार, महाराज ने चलते समय मना किया था की किसी से भी ब्यर्थ उलझना नही, मै ठीक हूँ इसलिये किसी से भी कोई युद्ध नही, आप सब कल सुबह भोर में ही वापसी की तैय्यारी कीजिये, हम स्नान कर चुकी, मेला भी देख चुकी है अब वापस चलिये, नहीं तो अगर कही महाराज को पता चला की युद्ध हुआ है तो हमें दुबारा कही भी जाने की अनुमति नही मिलेगी” रानी मल्हना ने कहा

“जैसी महरानी की आज्ञा” बक्षराज ने सिर झुका कर कहा

“सरदार सैय्यद आप भी तैय्यारी कर ले कल भोर में आप भी हमारे साथ प्रस्थान करेंगे” रानी ने सैय्यद से कहा

सैय्यद ने सिर झुका कर सहमति दी |

क्रमशः
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Thursday, 3 August 2017

चंद्रोदय - 10

21:44:00
(गतांक से आगे )
(भाग-1)

दक्षराज और बक्षराज दोनों देवि उपासक थे जो नित्य संध्या वंदना अवश्य करते थे, गंगा घाट की पावन भूमि पर भी दक्षराज और बक्षराज दोनों कुछ सैनिको को साथ ले एकांत सूनसान स्थान पर संध्या वंदना के लिये शाम के समय चले गये |

माहिल ने यही समय ही उचित समझा और करिंघा तक खबर पहुंचा दी और खुद डेरे से दूर भाग गया |

करिंघा अपनी मौसी से मिलने महुबे के डेरे पर आ गया, पहरेदारो ने परिचय जान कर करिंघा को रानी मल्हना तक पहुचा दिया |
“चरण स्पर्श मौसी,” करिंघा ने मल्हना के पैर छूते हुये कहा

“आशीर्वाद” मल्हना ने पहचानते हुये आशीर्वाद दिया

“मुझे तो आप ही खुश कर सकती हो मौसी” करिंघा ने कहा

“वो कैसे ?” मल्हना ने पूंछा

“मुझे, अपना नौलखा हार दे कर” करिंघा जानता था की बनाफर सरदार कभी भी आ सकते है इसलिये सीधे विषय पर आ गया |

“नौलखा हार ????? तुम क्या करोगे उसका ?” मल्हना ने आश्चर्य से पूंछा

“मौसी, बेकार के प्रश्न ना पूंछो, अपना नौलखा हार मुझे दे दो बस” करिंघा क्रोधित सा होने लगा

“पागल हो गये हो क्या ? अपने पूर्वजो का हार मै तुम्हे क्यों दे दू ?” मल्हना ने भी क्रोधित होते हुये पूंछा

“ख़ुशी ख़ुशी दे दो, नही तो तलवार के बल तो मै ले ही लूँगा” करिंघा अपनी तलवार निकालते हुये बोला

रानी मल्हना ने ताली बजा कर द्वार पर खड़े सैनिको को बुला लिया, खुद भी अपनी कटार निकाल ली, करिंघा ने आये हुये सैनिको पर वार करना शुरू कर दिया, सैनिक करिंघा की फुर्ती का सामना नही कर पा रहे थे, घायल होते जा रहे थे| खटक खटक की आवाजे, घायल सैनिको की कराहने की आवाजे, महिलाओं का भय से चीखने की आवाजे और करिंघा का गर्जन स्वर साफ़ साफ़ दूर दूर तक सुनाई देने लगा |

यह आवाज ताला सैय्यद तक भी गई, उसे लगा शायद कही युद्ध होने लगा, शोर सुन कर जानने की जिज्ञासा हुई, ध्यान से सुनने पर ताला सैय्यद समझ गया की आवाजे गढ़ महुबे के डेरे से आ रही है |

“बचाओ बचाओ” का शोर महिलाओं का ताला सैय्यद ने साफ़ साफ़ सुना
“ओह्ह तो कोई स्त्रियों को लूट रहा है” सोचते ही ताला सैय्यद महुबे के डेरे की ओर भागे |

जैसे ही ताला सैय्यद वहाँ पहुचे उन्होंने देखा की चारो ओर घायल सैनिक कराह रहे है और करिंघा रानी मल्हना से छीना झपटी कर रहा है |

“ठहर ठहर ! दुष्ट, ये गंगाघाट के पवित्र स्थान है यहाँ तू एक स्त्री का अपमान करने का दु साहस कर रहा है” बोलते हुये ताला सैय्यद करिंघा की ओर बढ़ गया |

करिंघा ने भी मल्हना को छोड़ा ओर सैय्यद की ओर लपका “खटाक खटाक” दोनों की तलवारे आपस में भिड़ी, बिजली सी चिंगारी फूटी, गजब की फुर्ती दिखाई ताला सैय्यद ने, दोनों की तलवारे भिड़ी हुई थी की सैय्यद ने पैतरा बदलते हुये उछल कर एक पैर से जोर दार प्रहार किया करिंघा की छाती पर, करिंघा उछल कर दूर जा गिरा उसकी तलवार भी हाँथ से छूट गई, करिंघा जैसे तैसे संभला और भाग खड़ा हुआ |

“आप ठीक है ना ?” ताला सैय्यद ने रानी मल्हना से पूंछा |

“हां मै ठीक हूँ, परन्तु आप कौन है? जिन्होंने ने मेरी जरुरत पर मदद की” मल्हना ने पूंछा

“मै बनारस का सरदार ताला सैय्यद हूँ” अपना परिचय देते हुये सैय्यद ने बताया |

थोड़ी ही देर में महुबे के डेरे के बाहर भीड़ लग गई, दक्षराज और बक्षराज भी संध्या वंदना से वापस आ गये, भीड़ और घायल सैनिक देख कर सब समझ गये फिर सैनिको से उन्हें पता चल गया की करिंघा नौलखा हार लूटने की नीयत से  रानी मल्हना के पास आया था लेकिन ताला सैय्यद के  लिये कारण सफल नही हो पाया |

क्रमशः
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Friday, 14 July 2017

चंद्रोदय - 9

23:13:00
(गतांक से आगे )

माड़ोगढ़ का राजकुमार करिंघा जब माड़ोगढ़ से जाजमऊ के लिये चला वह अपनी माँ कुशला से आशीर्वाद लेने गया वही उसकी बहन विजना भी उपस्थित थी | सामान्य रूप से विजना ने अपने भाई करिंघा से पूछा-

“मेरे लिये मेला से क्या लाओगे ?”

“बोल तुझे क्या चाहिये? वही ले आऊंगा” करिंघा ने खुश हो कर पूछा

“भैया मेरे लिये ऐसा कुछ लाना जो दुनिया में मेरे अलावा किसी के भी पास ना हो” विजना ने कहा

“ऐसा क्या होता है ? जो दुनिया में किसी के भी पास न हो” करिंघा ने आश्चर्य के साथ पूछा

“नौलखा हार” विजना ने हसँते हुये कहा

“क्या नौलखा हार ? चल तेरे लिये नौलखा हार ही लाऊंगा” करिंघा ने गर्व के साथ कहा

“ऐ बेटा, नौलखा हार मेलो ठेलो में नही मिलते, नाहक परेशान ना होना, नौलखा हार केवल मेरी बहन मल्हना के पास है और कही भी किसी के पास नौलखा हार नही है, तुम तो विजना के लिये कपडे, आभूषण आदि ही कुछ ले आना, वही पर्याप्त है” सारी वार्ता सुन रही कुशला ने अपने पुत्र को समझाया |

 “नही माँ, मै राजा जम्बे का पुत्र हूँ जो हमें रुच जाये तो वो हम ले ही लेते है चाहे सरलता से मिले या तलवार की नोक से हमें मिले” करिंघा ने जोश मिले धमंड के साथ कहा

“ऐ बेटा, इस जोश में तुम कही महुबे के बनाफरो से  अनावाश्यक उलझ ना जाना ......समझे, जाओ गंगा स्नान करो और सकुशल वापस आओ” कुशला ने करिंघा को फिर से समझाया |

“जी” बोल कर करिंघा वापस चल दिया

करिंघा सबसे विदा ले जाजमऊ गंगाघाट के दसहरे मेले में आ गया, गंगा स्नान के बाद वह अपनी बहन विजना के लिये खरीददारी करने निकल पड़ा, वही घूमते घूमते उसकी भेट उरई के राजा माहिल से हो गई |

“राम राम मामा” करिंघा ने माहिल को देखते ही अभिबादन किया
“राम राम राजकुमार” माहिल ने कहा

सामान्य भेट वार्ता से माहिल को पता चला की करिंघा की बहन ने मजाक में करिंघा से नौलखा हार माँगा है |

“राजकुमार करिंघा, नौलखा हार तो केवल गढ़ महुबे की रानी मल्हना के पास ही मिलेगा, दूसरा तो मिलाने से रहा” माहिल ने सुझाव दिया

“वो तो मौसी देने से रही” करिंघा ने कहा

“क्या भांजे ? राजा जम्बे के पुत्र हो कर भी इस प्रकार कायरों सी बांते, राजा जम्बे की तलवार का डंका पूरे भारत वर्ष में बजता है बड़े बड़े योद्धा भी जिसके नाम से भय खाते हो उसका पुत्र और इस प्रकार किसी से कुछ मांगेगा तो क्या अच्छा लगेगा ? शक्तिशाली राजा के लडके हो जो माँगने से मिलो ले लो, जो मांगने से ना मिले उसे अपनी ताकत से छीन लो” महिल ने अपनी कूटनीतिक बांटे शुरू कर दी

“लेकिन .............?” करिंघा सोंच में पड़ गया

“लेकिन वेकिन कुछ नही, वीर भोग्या वसुंधरा, हांथी, घोडा, सैनिक हर बल में सर्वश्रेष्ट हो, जिसमे सामर्थ्य होती है वही सब सुखो का अधिकारी होता है ...... इसलिये जाओ मेरे प्रिय बहादुर राजकुमार, माँगने पर अगर मेरी बहन तुम्हे नौलखा हर दे दे तो शांति पूर्वक ले लेना अगर शांति से ना दे तो अपनी ताकत से छीन लो उससे वो हार जिसकी वो सुरक्षा भी कर सकती उसे इतना कीमती हार रखने का कोई अधिकार नही” माहिल ने करिंघा को बड़े प्यार से समझाया

“लेकिन मामा मैंने तो सुना है महुबे के बनाफर सरदार बहुत पराक्रमी योद्धा है उन्हें हराना असंभव है, बड़े लड़ैया गढ़ महुबे के मैंने तो यही सुना है, अगर वो मुझे पा गये तो क्या छोड़ेंगे?” करिंघा ने शंका ब्यक्त की-

“वो बनाफर, जंगली, असभ्य वो काहे के योद्धा ? उन्हें तो युद्ध के नियम भी नही पता होंगे, तुम उनसे डर रहे हो ......... चलो कोई बात नही, तुम्हारा मामा किस दिन काम आयेगा जब डेरे में दोनों दक्षराज और बक्षराज बनाफर नही होंगे मै तुम्हे बता दूंगा, तुम अपनी मौसी से मिलने के बहाने जाना और हार मांगना दे दे तो ले आना अगर ना दे तो हार लूट लेना, वो ठहरी औरत जात अकेली तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ पायेगी और अगर कोई सैनिक आ भी जाये तो तुम सक्षम हो निपटा देना उसे, हाँ इतना है हार मिलते ही माड़ोगढ़ भाग जाना, हार के लिये राजा परिमल माड़ोगढ़ जा कर लड़ाई करे इतनी हिम्मत नही है उसमे” महिल ने कुटिलता पूर्वक समझाया
“एक बात बताओ मामा, आप मुझ पर इतना मेहरबान क्यों हो ? जैसे मेरी माँ आपकी बहन है वैसे ही मेरी मौसी भी तो आपकी बहन है, फिर आप मेरा साथ क्यों दे रहे हो ?” करिंघा ने मुस्कुरा कर पूछा

“कोई मेहरबानी नही है ये भांजे, ये महुबे बालो ने मेरे बाप दादा के समय से चला आ रहा मेरा कालिंजर और महुबे का किला मुझसे छीन लिया, तो मै कभी इनका भला नही सोचता, मेरे शत्रु है ये और मै इनके हर शत्रु का मित्र हूँ” माहिल गुस्से में बोला

“ठीक है मामा, मुझे उससे क्या मुझे तो केवल नौलखा हार चाहिये चाहे जैसे मिले, आप तो मुझे उचित समय पर बता देना जब बनाफर डेरे में ना हो” बोल कर करिंघा चल दिया |

माहिल मुस्कुरा दिया, उसे लगा उसकी कुटिल योजना सफल हो गई | अगर करिंघा नौलखा हार ले गया तो चंदेल माड़ोगढ़ जा कर युद्ध करने से रहे तो हर तो जायेगा ही साथ ही उनकी रानियाँ भी सुरक्षित नही ये कलंक तो लगेगा ही और यदि चंदेल युद्ध करने माड़ोगढ़ गये तो माड़ोगढ़ के बघेल कमजोर भी नही है, चंदेल वंश का अंत करके ही मानेगे, दोनों ही दशाओं में माहिल को ख़ुशी मिलेगी | बस सही समय की प्रतीक्षा थी|


क्रमशः
copyright@Ambika Sharma




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Wednesday, 5 July 2017

चंद्रोदय - 8

22:22:00
(गतांक से आगे )

इस समय तक भारत में मुस्लिम आक्रमण होने लगे थे | मुस्लिम धर्म प्रचारक भी इस्लाम का प्रचार करने भारत आने लगे थे | कुछ लौट कर वापस गये तो कुछ यही की संस्कृति में रच बस गये |इसी क्रम में सैय्यद ताला अपने पिता के साथ यहाँ आये, फिर यही भारतीय संस्कृति में रच गये, युवा होने पर ताला सैय्यद एक उच्च कोटि के योद्धा के रूप में उभरे, गोरा लाल रंग, भरा पूरा चेहरा, अच्छी कद काठी, पठानों सी बढी दाढ़ी, युद्ध कला में निपुण साथ ही युद्ध की रणनीत बनाने में और युद्ध संचालन में कुशल ताला सैय्यद बनारस के सरदार थे |

ताला सैय्यद की किसी बात पर, बनारस के रजा से अनबन हो गई, नाराज ताला सैय्यद ने बनारस छोड़ दिया और कन्नौज जाने का निश्चय कर लिया क्यों की कन्नौज में अच्छे योद्धाओ को बड़ा सम्मान मिलता था | कन्नौज जाते समय रास्ते में उन्हें गंगा मेला की जानकारी मिली तो वो अपने सैनिको सहित जाजमऊ आ गये मेला देखने, महुबे के डेरे के समीप ही ताला सैय्यद का डेरा भी लगा था |

जाजमऊ के गंगा घाट पर बहुत दूर दूर से राजा, राज कुमार, राजबाड़े के लोग आये थे | सभी के अलग अलग डेरे सजे थे | इसी मेले में माड़ोगढ़ के राजा जम्बे का पुत्र करिंघा भी आया था करिंघा अर्थात रानी मल्हना की सगी बहन कुशला का जेष्ट पुत्र, मल्हना की बहन कुशला मेले में नही आई थी |

क्रमशः
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Monday, 26 June 2017

चंद्रोदय - 7

01:05:00
(गतांक से आगे )

जेठ मास में दशहरा के अवसर पर जाजमऊ में गंगा घाट का मेला था | दूर दूर राज्यों से लोग मेले में शामिल होने आते थे, मेले का पता चलते रानी मल्हना के भी मन में इच्छा हुई मेला देखने और गंगा स्नान की, रानी ने अपनी इच्छा राजा परिमल से जताई लेकिन राजा ने मना कर दिया|

राजा परिमल अपनी विशेष सभा में थे, जहाँ केवल विशेष राज पुरुष ही उपस्थित थे, रानी मल्हना वही विशेष सभा में पहुँची और राजा से पुनः विन्रम निवेदन किया

“महाराज, जाजमऊ का गंगा दशहरे का मेला है, में ही नही, रनिवास की सभी महिलाओं की इच्छा है की मेला देखने और गंगा स्नान के लिये चला जाय, बहुत ही शुभ महूर्त है, फिर जैसी आपकी आज्ञा हो”

“नही रानी, आपको तो पता है, वहाँ मेले में, कई देश के राजा, राजकुमार, लुटेरे, अच्छे बुरे हर प्रकार के लोग आते है, ऐसे में कोई बात हो जाये तो ?” राजा परिमल ने दुखी होते हुये कहा

“तो उनका उत्तर देने के लिये हमारे महुबे के वीर योद्धा तो हमारे साथ होंगे ही” रानी ने समझाने की कोशिश की

“नही रानी, ये समय खराब है, मै महुबे को छोड़ कर नही चल सकता, सेनापति जगन्नायक भी महुबे से बाहर नही जा सकते, दक्षराज दासराज पुरवा नही छोड़ सकते ना ही बक्षराज गढ़ी सिरसा छोड़ सकते है अब बचे यहाँ रहिमल, टोडर या फिर आपके भाई महिल, परन्तु ये इतने सक्षम नही है की समुचित उत्तर किसी भी दुष्ट को दे सके, इसलिए उचित यही होगा की आप गंगा मेला छोडिये यही प्रसन्नता पूर्वक दसहरा मनाइये” राजा परिमल ने अपनी मजबूरी समझाई

“इतने बड़े गढ़ महुबे में कोई भी एक योद्धा नही है जो हमें गंगा स्नान करवा दे” रानी उदास हो कर बोली
“क्षमा करे महारानी जी, यदि महाराज आज्ञा दे तो मै अकेले ही आपको गंगा स्नान करवाने में सक्षम हूँ” दक्षराज ने भुजा उठा कर कहा

“आप अकेले क्यों? यदि महाराज की आज्ञा मिले तो मै भी आपके साथ चलूँगा” बक्षराज ने कहा

“आप दोनों चले जायेंगे तो दासराज पुरवा और सिरसा को कौन सम्हालेगा ?” राजा परिमल ने पूंछा

“क्षमा करें महाराज, मात्र पंद्रह दिन की बात है, यदि महारानी की इच्छा है तो उन्हें गंगा स्नान करवाया जा सकता है रही बात यहाँ की ब्यबस्था की तो पंद्रह दिन के लिये हम प्रबंध कर लेगे फिर जैसी आपकी आज्ञा” दक्षराज ने कहा

राजा परिमल सोंच में पड़ गये, काफी सोंच विचार कर उन्होंने राज गुरु चिंतामणि से विमर्श किया और घोषणा की

“रानी मल्हना, जिस किसी की भी गंगा स्नान की इच्छा हो वो दसहरे मेले की तैय्यारी कर ले, दक्षराज और बक्षराज सरदार की अगुवाई में चला जाये, दोनों सामंत आप सब को लेकर जायेगे, हमारी आज्ञा है”

“महाराज क्षमा करे, बनाफर सामंतो पर इतना विश्वास उचित नही है” राजा माहिल ने रंग में भंग किया

“हूँ . . . .यह भी सही है फिर तो ऐसा करे राजा माहिल आप भी साथ में चले ही जायें, तो फिर किसी को भी कोई चिंता नही रहेगी” राजा परिमल ने मुस्कुरा कर ब्यंगात्मक भाव से कहा

माहिल निरुत्तर था, “जैसी महाराज की आज्ञा” बहुत धीरे से बोला - कार्यक्रम निर्धारित हो गया, गढ़ महुबे में डंका बज गया

“जिन्हें भी जाजमऊ का दसहरा मेला और गंगा स्नान की इच्छा हो वो सब तैय्यारी बना ले साथ चले, साथ रहे, सुरक्षित चले और सुरक्षित वापस आयें”

हांथी, घोडा, पालकियाँ सब सज गये, सैनिको के लश्कर भी तैयार हो गये, रानी मल्हना, युवराज ब्रम्हा के साथ देवला और उसका पुत्र आल्हा, ब्रम्हला के दोनों पुत्र मलिखे और सुलिखे, महुबे के प्रमुख संभ्रांत परिवारों के स्त्री पुरुष, बच्चे, सामान्य परिवार के सदस्य सभी सजी हुई बैलगाडियों में बैठ गये, मंगल गीत गाती स्त्रियाँ सब साथ चल दी |

लश्कर को विदा करते समय राजा परिमल ने सबको समझाया

“जाजमऊ, राजा जयचंद की सीमा में पड़ता है, वही पास में ही अजयपाल का क्षेत्र भी है, ये दोनों ही शक्तिशाली है इनसे भूल कर भी मत उलझना, राजा जयचंद यूं तो हमारे अच्छे ब्यहारी है लेकिन फिर भी उन्हें पता नही चलना चाहिये की महुबे से कोई आया भी है, जितनी जल्दी हो सके स्न्नान उपरान्त वापस आ जाना, मेरी शुभकामनायें, आशीर्वाद सब आपके साथ है मुझे चिंता रहेगी,इसलिये जल्दी आना, माँ चंद्रिकन और मनिया देव आप सब का कल्याण करे”

“माँ चंद्रिकन की जय , मनिया देव की जय” के उदघोष के साथ लश्कर चल पड़ा |

गढ़ महुबे का लश्कर जाजमऊ पहुँच गया, एक सुरक्षित स्थान तय कर, गढ़ महुबे का डेरा गंगा किनारे लग गया, डेरे के मध्य भाग में महिलाओं को स्थान दिया गया, उनके चारो ओर गोल घेरे में सामंतो,सैनिको और अनुचरो को स्थान दिया गया | रुकने की ब्यवस्था पूर्ण कर सभी मेले का आनंद लेने लगे |

क्रमशः
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AMBIKA SHARMA
AUTHOR, MOTIVATOR, TRAINER, BLOGGER
is famous for his unpublished Novel "AARYAN - EK ALOKIK YOUDHA(आर्यन - एक अलौकिक योद्धा)". Mostly authors known for his English Novels but he is standing in the same lobby for his Hindi novels. Currently his Novel "KAUN JEETA AUR KYU (कौन जीता और क्यों)" is available on all e-commerce websites and leading Bookstores. it is another step of success and he enjoying its bestselling. his another Book is also ready to publish name "PARO KE DIYE (पारो के दीये)" and will be available in 2017.

najar.ambika@gmail.com

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