(गतांक से आगे )
जेठ मास में दशहरा के अवसर पर जाजमऊ में गंगा घाट का मेला
था | दूर दूर राज्यों से लोग मेले में शामिल होने आते थे, मेले का पता चलते रानी
मल्हना के भी मन में इच्छा हुई मेला देखने और गंगा स्नान की, रानी ने अपनी इच्छा
राजा परिमल से जताई लेकिन राजा ने मना कर दिया|
राजा परिमल
अपनी विशेष सभा में थे, जहाँ केवल विशेष राज पुरुष ही उपस्थित थे, रानी मल्हना वही
विशेष सभा में पहुँची और राजा से पुनः विन्रम निवेदन किया
“महाराज, जाजमऊ का गंगा दशहरे का मेला है, में ही नही,
रनिवास की सभी महिलाओं की इच्छा है की मेला देखने और गंगा स्नान के लिये चला जाय,
बहुत ही शुभ महूर्त है, फिर जैसी आपकी आज्ञा हो”
“नही रानी, आपको तो पता है, वहाँ मेले में, कई देश के राजा,
राजकुमार, लुटेरे, अच्छे बुरे हर प्रकार के लोग आते है, ऐसे में कोई बात हो जाये
तो ?” राजा परिमल ने दुखी होते हुये कहा
“तो उनका उत्तर देने के लिये हमारे महुबे के वीर योद्धा तो
हमारे साथ होंगे ही” रानी ने समझाने की कोशिश की
“नही रानी, ये समय खराब है, मै महुबे को छोड़ कर नही चल
सकता, सेनापति जगन्नायक भी महुबे से बाहर नही जा सकते, दक्षराज दासराज पुरवा नही
छोड़ सकते ना ही बक्षराज गढ़ी सिरसा छोड़ सकते है अब बचे यहाँ रहिमल, टोडर या फिर
आपके भाई महिल, परन्तु ये इतने सक्षम नही है की समुचित उत्तर किसी भी दुष्ट को दे
सके, इसलिए उचित यही होगा की आप गंगा मेला छोडिये यही प्रसन्नता पूर्वक दसहरा
मनाइये” राजा परिमल ने अपनी मजबूरी समझाई
“इतने बड़े गढ़ महुबे में कोई भी एक योद्धा नही है जो हमें
गंगा स्नान करवा दे” रानी उदास हो कर बोली
“क्षमा करे महारानी जी, यदि महाराज आज्ञा दे तो मै अकेले ही
आपको गंगा स्नान करवाने में सक्षम हूँ” दक्षराज ने भुजा उठा कर कहा
“आप अकेले क्यों? यदि महाराज की आज्ञा मिले तो मै भी आपके
साथ चलूँगा” बक्षराज ने कहा
“आप दोनों चले जायेंगे तो दासराज पुरवा और सिरसा को कौन
सम्हालेगा ?” राजा परिमल ने पूंछा
“क्षमा करें महाराज, मात्र पंद्रह दिन की बात है, यदि
महारानी की इच्छा है तो उन्हें गंगा स्नान करवाया जा सकता है रही बात यहाँ की
ब्यबस्था की तो पंद्रह दिन के लिये हम प्रबंध कर लेगे फिर जैसी आपकी आज्ञा” दक्षराज
ने कहा
राजा परिमल सोंच में पड़ गये, काफी सोंच विचार कर उन्होंने
राज गुरु चिंतामणि से विमर्श किया और घोषणा की
“रानी मल्हना, जिस किसी की भी गंगा स्नान की इच्छा हो वो
दसहरे मेले की तैय्यारी कर ले, दक्षराज और बक्षराज सरदार की अगुवाई में चला जाये,
दोनों सामंत आप सब को लेकर जायेगे, हमारी आज्ञा है”
“महाराज क्षमा करे, बनाफर सामंतो पर इतना विश्वास उचित नही
है” राजा माहिल ने रंग में भंग किया
“हूँ . . . .यह भी सही है फिर तो ऐसा करे राजा माहिल आप भी
साथ में चले ही जायें, तो फिर किसी को भी कोई चिंता नही रहेगी” राजा परिमल ने
मुस्कुरा कर ब्यंगात्मक भाव से कहा
माहिल निरुत्तर था, “जैसी महाराज की आज्ञा” बहुत धीरे से
बोला - कार्यक्रम
निर्धारित हो गया, गढ़ महुबे में डंका बज गया
“जिन्हें भी जाजमऊ का दसहरा मेला और गंगा स्नान की इच्छा हो
वो सब तैय्यारी बना ले साथ चले, साथ रहे, सुरक्षित चले और सुरक्षित वापस आयें”
हांथी,
घोडा, पालकियाँ सब सज गये, सैनिको के लश्कर भी तैयार हो गये, रानी मल्हना, युवराज
ब्रम्हा के साथ देवला और उसका पुत्र आल्हा, ब्रम्हला के दोनों पुत्र मलिखे और
सुलिखे, महुबे के प्रमुख संभ्रांत परिवारों के स्त्री पुरुष, बच्चे, सामान्य
परिवार के सदस्य सभी सजी हुई बैलगाडियों में बैठ गये, मंगल गीत गाती स्त्रियाँ सब
साथ चल दी |
लश्कर को विदा
करते समय राजा परिमल ने सबको समझाया
“जाजमऊ, राजा जयचंद की सीमा में पड़ता है, वही पास में ही
अजयपाल का क्षेत्र भी है, ये दोनों ही शक्तिशाली है इनसे भूल कर भी मत उलझना, राजा
जयचंद यूं तो हमारे अच्छे ब्यहारी है लेकिन फिर भी उन्हें पता नही चलना चाहिये की
महुबे से कोई आया भी है, जितनी जल्दी हो सके स्न्नान उपरान्त वापस आ जाना, मेरी
शुभकामनायें, आशीर्वाद सब आपके साथ है मुझे चिंता रहेगी,इसलिये जल्दी आना, माँ
चंद्रिकन और मनिया देव आप सब का कल्याण करे”
“माँ चंद्रिकन की जय , मनिया देव की जय” के उदघोष के साथ
लश्कर चल पड़ा |
गढ़
महुबे का लश्कर जाजमऊ पहुँच गया, एक सुरक्षित स्थान तय कर, गढ़ महुबे का डेरा गंगा
किनारे लग गया, डेरे के मध्य भाग में महिलाओं को स्थान दिया गया, उनके चारो ओर गोल
घेरे में सामंतो,सैनिको और अनुचरो को स्थान दिया गया | रुकने की ब्यवस्था पूर्ण कर
सभी मेले का आनंद लेने लगे |
क्रमशः
copyright@Ambika Sharma
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