“मास्टर साब गाड़ी छूट
जायेगी, अब भगवान् को छुट्टी दे दीजिये” सुधा ने मुस्कुराते हुये ब्यंगात्मक शैली
में अविनाश से कहा
“नही छूटेगी गाड़ी , मेरी
पूजा हो गई है तुम थाली लाओ ,भोजन करके चलते है” अविनाश ने भी मुस्कुराते हुये कहा
सुधा रसोई गई और भोजन की
थाली लेकर आ गई ,
अविनाश से बोली “जब हम
लोगो को ट्रेन पकड़नी थी तो एक दिन न करते इतनी बड़ी पूजा, छोटी कर लेते यो न करते एक
दिन पूजा भगवान तो सब जानते है”
“मै पूजा करू या न करू
भगवान् को कोई फर्क नही पड़ता लेकिन जब हम एक दिन खाना नही छोड़ते, कोई भी जरूरी काम
नही छोड़ते तो केवल भगवान् को ही इस सुन्दर जीवन देने के बदले धन्यबाद देने में
समझौता क्यों करना, अब जल्दी से सामान उठाओ चलो चले, समय हो भी रहा है” भोजन करते
करते अविनाश ने कहा
अविनाश सुधा को एक
परीक्षा दिलवाने के लिये पंजाब लेकर जा रहा था इन्हें झाँसी से पंजाब मेल ट्रेन से
जाना था . दोनों झाँसी रेलवे प्लेटफार्म में आ गये.
“मुझे एक बात बताओ ?”
सुधा ने प्लेटफार्म में बैठे बैठे समय ब्यतीत करने के हिसाब से अविनाश से पूछा
“हाँ पूछो” अविनाश ने कहा
“तुम इतनी पूजा करते हो
तुम्हे कभी तुम्हारे भगवान् मिले भी है ?”
“मिलते तो है पर पता नही
चलता कब किस रूप में कैसे मिल जाते है वो तो बाद में ही समझ पाता हूँ”
“मास्टर साहब का ज्ञान और
मास्टर साहब की शिक्षा दोनों को समझाना कठिन है” सुधा हसते हुये बोली
“वो सब छोडो , गाडी आने
बाली है उदघोषना हो चुकी है सामान उठाओ” बोल कर अविनाश खड़ा हो गया
पंजाब मेल आ गई अविनाश और
सुधा अपने आरंक्षण बाले डिब्बे में चढ़ गये अपनी सीट पर जा कर सामान रख कर बैठ गये
“ऐ सुनो कुछ तवियत गड़बड़ा
रही है बेचैनी सी हो रही है मानो उल्टी हो जायेगी” सुधा ने अविनाश से मुंह बनाते
हुये कहा
“अरे कुछ नही अभी गाड़ी
चलेगी तो हवा लगेगी सब ठीक हो जायेगा” अविनाश ने सुधा को तसल्ली दी
दरअसल सुधा गर्भवती थी
चार माह हो चुके थे पहली बार गर्भवती हुई थी उस पर भी इतनी लम्बी यात्रा थी तो
सुधा का डर स्वाभाविक था. अविनाश एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक था वह चाहता था की
उसकी पत्नि सुधा भी अध्यापक बने इसलिए
सुधा को बी एड की प्रवेश परीक्षा दिलाने पंजाब ले कर जा रहा था.
“हम लोग दिल्ली कितनी देर
में पंहुच जांएगे” सुधा ने पूछा
“लगभग छ घंटे लगेगे”
अविनाश ने कहा
“ दिल्ली? लेकिन ये गाड़ी तो बम्बई जा रही है” सामने बैठे
एक सहयात्री ने टोका
तब तक ट्रेन चलने की सीटी
बजा रही थी .
“तो क्या यह पंजाब मेल“ नही है ?” अविनाश ने चौकते हुये पूछा
“हाँ है तो पंजाब मेल ही
लेकिन दिल्ली जाने बाली नही दिल्ली से आने बाली पंजाब मेल है” सह यात्री ने उत्तर
दिया
“ओह ...............”
बोलते बोलते अविनाश को समझ में आ गया की वह गलत गाड़ी में बैठ गया है , तब तक गाड़ी
धीरे धीरे चलने लगी , अविनाश ने जल्दी जल्दी सामान उठाया और सुधा से बोला “चलो
उतरो”
अविनाश चलती गाड़ी से उतर
गया गाड़ी की गति तेज होती जा रही थी अविनाश को लगा शायद सुधा अब गाड़ी से उतर नही
पायेगी वो बहुत तेज चिल्लाया “कोई चैन खीचो”
कोई भी चैन खीचता उसके
पहले ही सुधा चलती गाडी से कूद गई , सुधा कूदने के बाद खुद को संभाल नही पाई , गिर
गई , बहुत तेज लुढ़कती हुई ट्रेन की और जा रही थी अविनाश ने अपना सामन अलग फेका और
सुधा की और दौड़ा सुधा ट्रेन के पहियों की चपेट में नही आ पाई बच गई थी , अविनाश ने
सुधा को उठाया सुधा की कोई भी चोट दिखाई नही दे रही थी लेकिन वो डर से या फिर
घबराहट से आँखे बंद किये पड़ी थी , देखते
ही अविनाश और सुधा के चारो और भीड़ लग गई .
“सुधा . . . . . सुधा” अविनाश सुधा को गोद में लिये पुकार
रहा था .
सुधा लगभग बेहोशी की हालत
में थी , अविनाश की आँखों में आंसू आ गये, उसकी समझ में कुछ भी नही आ रहा था वो
क्या करे, उम्र ही अभी क्या थी उसकी पिछले वर्ष ही तो उसकी शादी हुई थी सुधा के
साथ, कितने खुश थे दोनों एक दुसरे के साथ दोनों का गोरा रंग, दोनों गजब के सुन्दर ,
दोनों ही पढ़े लिखे समझदार , बहुत कम ही समय में दोनों एक दुसरे को बहुत अच्छे से
समझने लगे थे. एक दुसरे की जरूरतों को बिना बताये समझ लेते थे . न जाने किसकी नजर
लग गई ?
“सुधा . . . . . सुधा . . . . . .उठो सुधा” अविनाश ने सुधा सिर के
सिर पर हाथ फेरते हुये प्यार से कहा लेकिन सुधा बेहोश ही थी .
“शायद अंदरूनी चोट है ,
डाक्टर को दिखाना पड़ेगा” भीड़ में खड़े किसी ने कहा
“अरे यहाँ स्टेशन पर भी
तो चोट आदि के इलाज की सुविधा होती है कोई स्टेशन मास्टर के पास चला जाये” किसी एक ने कहा
“ये तो पुलिस केश है, पहले
रिपोर्ट करनी पड़ेगी” किसी ने कहा
“कैसे गिरी?”
“क्यों गिरी ?”
जितने मुंह उतनी बातें
लेकिन सार्थक बातें कोई भी नही ,
“हटो . . . .हटो” भीड़ को
चीरता हुआ एक अधेड़ उम्र का पढ़ा लिखा संभ्रांत सा दिखने बाला एक पुरुष आगे आया “मुझे
देखने दो” उस पुरुष ने कहा , उसकी आवाज में इतना बजन था की भीड़ ने उसे जगह दे दी .
उस पुरुष ने सब को हटा कर
सुधा को देखा उसकी नाडी देखी, आँखे खोल कर देखी , अपना ब्रीफकेश खोला कुछ यंत्र
निकाले और सुधा का परिक्षण करने लगा शायद कोई डाक्टर ही था . सब देखने के बाद
गंम्भीर मुद्रा में बोला
“देखो मै जिला चिकित्सालय
में डाक्टर हूँ , इनके ब्रेन में चोट आई है चोट गंम्भीर है यहाँ झाँसी में ब्रेन
इंजरी का विशेष इलाज नही है आप इन्हें दिल्ली लेकर जाइये यहाँ भी किसी को दिखायेगे
तो बाद में दिल्ली जाना ही पड़ेगा . .. . .
. .मै अभी कुछ इंजेक्शन इन्हें प्राथमिक चिकित्सा के रूप में दिए देता हूँ . . . . . . .
आप इन्हें अगली ही गाड़ी से देलही ले जाइये”
अविनाश को सलाह ठीक लगी
वो धीरे से बोला “हमारा पंजाब मेल से दिल्ली का आरंक्षण है , मै दिल्ली ही चला
जाता हूँ”
“लेकिन पंजाब मेल तो अभी
अभी लिकल गई” भीड़ में खड़े किसी ने बताया
“ट्रेन में भी टिकेट बन
जाता है आप टी टी से मिल लीजियेगा , है तो वो भी इन्सान ही कोई न कोई प्रवंध हो
जायेगा” एक ने सलाह दी
डाक्टर की सलाह पर अविनाश
और कुछ लोगो ने मिल कर सुधा को प्लेटफार्म की एक बेंच पर लिटा दिया डाक्टर कुछ
इंजेक्शन सुधा को देने लगा , सुधा का प्राथमिक इलाज शुरू हो गया अविनाश को कुछ
राहत मिली उसने अपना मोबाइल निकाला और अपने घर ससुराल में काल कर सूचना देने लगा.
“अभी इंजेक्शन दे दिये है
आप अब इन्हें अपोलो ले जाइये” डाक्टर ने अविनाश से कहा
“डाक्टर साहब आपकी फीस ?”
अविनाश ने पूछा
“अरे भाई यहाँ रास्ते में
तुम अपना पैसा बचा कर रखो” डाक्टर मुस्कुरा कर बोला और उसने पैसे नही लिये
उसी भीड़ में एक फौजी अपनी
पत्नी सहित खड़ा था वो अविनाश के पास आया और बोला
“देख भाई, मन्ने जालंधर
जन्या सी मन्नी गाड्डी आन बाली सी तो तू माँडे साथ दिल्ली चल आगे में देख लेवेगा”
अविनाश ने सहमति में सिर
हिलाया . अगली गाड़ी आते ही उसी फौजी की मदद से अविनाश ने सुधा को ट्रेन में चढ़ा
दिया फौजी ने अपनी शीट पर सुधा को लिटा दिया अविनाश ,सुधा का सिर अपनी गोद में रखा
कर उसी शीट पर बैठ गया. फौजी और उसकी पत्नी दूसरी शीट पर बैठ गये . गाड़ी दिल्ली को
चल पड़ी ,टी टी आया उससे फौजी ने ही बात की
अविनाश ,सुधा के पास बैठा रहा .
अविनाश बेहोश सुधा को देख
रहा था कितनी मासूम लग रही थी . सुधा की बड़ी बड़ी बोलती आँखे बंद थी, गुलाबी चेहरा कितना
शांत ,चहरे पर रहने बाली मुस्कराहट कितनी खामोश , अविनाश के आंसू बहने लगे “हे
ईश्वर यह किस पाप का दंड है मैंने और इसने किसी का क्या विगाडा ? अविनाश सोंच रहा
था , घर का भी कोई साथ नही , पता नही कब तक ये लोग आ पायेगे. अचानक सुधा के पैरो
में कुछ तिलझन सी हुई , उस फौजी की पत्नी तुरंत उठी और सुधा के पैर दवाने लगी ,
फौजी सब कुछ देख रहा था वो अविनाश को देख कर बोला “तू परेशान ना हो वाहे गुरु सब
ठीक करेगा”
समय धीरे धीरे बीत रहा था
फौजी रस्ते भर अविनाश को ढाढस बंधता रहा उसकी पत्नी रस्ते भर सुधा के तलवों की
मालिस कराती रही, पैर दवाती रही. दिल्ली आ गया.
फौजी और अविनाश ने सुधा
को ट्रेन से उतार लिया , फौजी जा कर स्ट्रेचर ले आया और कुछ फौजी भी जो सुधा को
लेकर स्टेशन से बाहर चल दिये अविनाश, वो फौजी और उसकी पत्नी सामान लेकर पीछे पीछे
चल दिये .
“आपको तो जांलधर जाना है
? आपकी ट्रेन न छूट जाये कही ? आप यही बैठिये” अविनाश ने फौजी से कहा
“तेरा काम ज्यादा जरूरी
है , मन्ने तो बाद में भी ट्रेन मिल जायेगी” फौजी ने जवाब दिया और अविनाश के साथ
चलता रहा
अविनाश को लगा पता नही ये
फौजी इतनी मदद क्यों कर रहा है ? कही कोई बदमाश तो नही ? एक तो मै वैसे ही परेशांन
हूँ सुधा को लेकर, अब कही ये लूट न ले , आज कल अपने बन कर ही तो लोग ठगते है हे
भगवान मेरी मदद करना .
एक टेक्सी लेकर वो सब
अपोलो हास्पिटल पहुँच गये टेक्सी का किराया उसी फौजी ने दिया , अब अविनाश को लगा
इतनी मदद कोई भी बिना मतलब नही करता ,पक्का ये सरदार फौजी ठग है लेकिन अविनाश करता
भी क्या अकेले होने पर कोई मदद भी तो दे रहा है वो भी बिना मांगे .
“इमरजेंसी में भी कोई शीट
खाली नही है” एडमिशन बिन्डो से मिला जवाब सुन कर अविनाश अन्दर तक काँप गया अब क्या
होगा क्या करूँ ? अविनाश सोंच रहा था
“ये वीआईपी कार्ड देख कर भी
आप पेशेंट को एडमिट नही करेगे ?” फौजी ने अपना कार्ड दिखाते हुये पूछा
“आप बड़े साब से बात कर लीजिये”
अन्दर से जबाब मिला
“पेशेंट को तो लेना ही
पड़ेगा तू मुझे जनता नही है , मै तो तेरी नौकरी ले लूगाँ तू जानता नही है, ये मेरे
छोटे भाई की पत्नी है” बड़बड़ाते हुये फौजी अन्दर अधिकारी से बात करने चला गया
संभवतः फौजी कोई बड़ा अधिकारी था थोड़ी देर में वापस आया तो अविनाश से बोला “तू जा
अन्दर फॉर्म भरवा के आ तब तक मै इसका इलाज शुरू करवाता हूँ”
अविनाश चुपचाप अन्दर जा
कर विवरण बताने लगा . ओपचारिकता करने के बाद जब अविनाश वापस आया तो देखा न वहा
फौजी ,न उसकी पत्नी और ना ही सुधा थी , अविनाश घबडा गया “लगता फौजी अपना काम कर
गया?” अविनाश ने सोंचा लेकिन सुधा को कहा ले गया, उसने उसी काउंटर में पूछा तो पता
चला इमरजेंसी बार्ड गये, पूछ समझ कर अविनाश इमरजेंसी बार्ड पहुच गया.
सुधा का इलाज शुरू हो
चुका था , फौजी की पत्नी सुधा के पास बैठी थी , अविनाश को देखते ही फौजी की पत्नी
ने
कहाँ “आओ बैठो डाक्टर देख
गये कुछ मेडिसिन मगाई है ये लेने गये है”
अविनाश वही बैठ गया ,
थोड़ी देर में फौजी आ गया मेडिसिन लेकर , सब बैठे थे.सुधा को होश आने का इन्तजार हो
रहा था . सुधा आई सी यूं में थी.
“तेरे पास कुछ पैसे है की
नही ?” फौजी ने अविनाश से पूछा
“हाँ दस हजार है” अविनाश
ने कहा
“इतने में क्या होगा ?
कुछ मेरे से ले ले” फौजी ने कहा
“नही, ऐ टी एम् कार्ड है
मेरे पास फिर घर से पापा चल दिये है सुबह तक आ जायेगे” अविनाश ने बताया
सब शांत बैठे रहे .
थोड़ी देर में डाक्टर ने
आकर बताया की एक रिपोर्ट बम्बई जायेगी फौजी ने कहा “मेरे कार्ड पर भेज
दीजिये सब खर्च उसी कोटे से पेमेंट हो जायेगे”
अब सब कुछ सामान्य था
डाक्टर अपना काम कर रहे थे, अविनाश अब सामान्य था. रात धीरे धीरे वीत गई सुबह होने
को थी अविनाश के साथ साथ फौजी और उसकी पत्नी भी रात भर जगे.
सुबह फौजी ने अविनाश से
कहा “तू अब ठीक है तेरे घर बाले भी अब आने बाले होगे अब हम लोग चलते है”
अविनाश उनके जाने की बात
सुन कर भाव विभोर हो गया फिर सामान्य हो कर उसने धीरे से पूछा “भाई साहब आपका नाम
क्या है”
“क्या करेगा जान कर?”फौजी
ने रूखा सा जवाब दिया
“अपना पता बगैरह कुछ तो
बता दीजिये”अविनाश ने फिर पूछा
“मन्ने अपना काम कर दिया
तू अपना काम कर” फौजी ने फिर कहा
“अरे मेडिसिन लाये है
आपका जहां जहाँ पैसा खर्च हुआ वो तो ले लीजिये”
“तू पागल है क्या? अपनी
पत्नी का अच्छे से इलाज करवा, मारी चिंता छोड़” इतना कह कर फौजी और उसकी पत्नी अपना
सामान लेकर चल दिये. अविनाश उन्हें छोड़ने उनके पीछे चल दिया. फौजी ने फिर टोका
“भाई तू अपना काम कर , मारे
पीछे मत आ”
वो दोनों चले गये.
अविनाश सोंच में था कौन
है ये ?
समय बीतता रहा सुधा को
होश आ गया आई सी यूं से जनरल वार्ड में आ गई अविनाश की मदद के के लिये उसके
पारिवारिक लोग भी उसके साथ थे.
एक दिन सुधा ने अविनाश से
पूछा “आप मुझे झाँसी से अकेले लेकर यहा तक आये मेरे पीछे कितना परेशान हुये न आप ?”
“मै अकेला कहाँ था ?भगवान मेरे साथ थे "अविनाश ने बताया फिर सुधा को पूरी कहानी
सुनाई कैसे वो सुधा को लेकर आया. पूरी कहानी सुनने के बाद सुधा ने पूछा “कौन थे वो
लोग जो भगवान बन कर आ गये ?”
“तुम अक्सर पूछती थी ना
की मैं भगवान से मिला हूँ या नही अब बताता हूँ,वो झाँसी में मिलने वाला डाक्टर और झाँसी से साथ आने बाले वो फौजी दम्पति भगवान थे
या नही ये तो मै नही जानता लेकिन इतना जरूर जानता हूँ की अगर भगवान भी मिलते तो वो
भी इसी तरह किसी रूप में ही मिलते” बोल कर अविनाश मुस्कुरा दिया .
सुधा भी हाथ जोड़ कर मुस्कुरा दी.
आपका ..........अम्बिका कुमार शर्मा (राजा)
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