हम यू पी वालों की
शामें अक्सर छत पर ही गुजरती है कारण बिजली | शाम होते ही बिजली का इन्तजार शुरू
हो जाता है। एक दिन, शाम का समय, हल्का-हल्का अंधेरा होने लगा था, मैं और मेरी
धर्मपत्नि दोनों, मच्छरों से युद्ध करते हुये, पर-निन्दा का भरपूर रस ले रहे थे। अचानक,
‘‘सरकाय ले ओ
खटिया.........’’
हमारे पडोसी रामलाल
का अति बेसुरा गर्दभ स्वर सुनाई दिया। धर्मपत्नि के चेहरे पर तिरछी मुस्कान खिल गई, हौले से एक भोंह चढा कर बोलीं-
‘‘सुन लो रामलाल भाईसाहब को
एैसी गर्मी में भी जाड़ा लग रहा है’ खटिया सरका रहे हैं।”
‘‘वायरल या मलेरिया हो गया
होगा सो जाड़ा लग गया, अब बुढापे में कौन-सी खटिया सरकायेंगे?‘‘
मैंने उसी अन्दाज मे उत्तर दिया |
हम दोनो एक साथ हँस पडें।
धीरे धीरे रामलाल जी
का स्वर तीव्र और गीत की आवृति बढने लगी।
मेरी भी सहन-शक्ति जवाब
देने लगी, मैं छत से छत जुडी होने
के कारण रामलाल के पास पहूँच गया।
‘‘क्या बात है रामलाल जी,
खटिया ज्यादा भारी हो गई क्या जो सरक नही रही और आप बराबर सरकाये जा
रहे हैं?‘‘ मैंने रामलाल से पूछा |
‘‘अरे नही शर्मा जी, खटिया तो वो सरका गये जिनको मौका मिला, अपने युवराज
पप्पू के खाट शो में, मैं तो चूक गया उसी का मातम मना रहा हूँ,
नहीं तो मेरा मुन्ना और उसकी माँ फर्श पर ना लेटती, काश एक
खाट शो हमारे इलाके मे भी हो जाये‘‘ रामलाल ने अपना दर्द
बताया |
‘‘तो ये कहिये आप खटिया न
सरका पाने का दुःख मना रहे हैं‘‘ मैने हंसते हुये पूछा
‘‘हाँ भाई, अब ज्यो-ज्यो चुनाव नजदीक आयेगे, सभी पार्टी अपनी
अपनी खाट, वोटरो को परोसेगे, वोटर कैसे
तो बैठे उनकी खाट पर‘‘ रामलाल हँसने लगे |
‘‘हाँ बात तो आपकी सही है,
एक युवराज कह रहे है हम जीते तो लेपटाप नही अबके स्मार्ट फोन बाटेगे,
एक कह रहे है हम कर्जा माफ करेगे, फिर बाद में
कहेंगे सरकारी खजाना खाली हो गया टेक्स बढाना पडेगा, कुछ भी
हो गाज तो आम आदमी पर ही गिरेगी ना?‘‘ मैने भी समर्थन किया
‘‘वोट बैंक की राजनीति रह
गई है, कोई जाति विशेष के नाम पर, तो
कोई धर्म विशेष के नाम पर, दर्द उछालेगा, आपस में हमें बांटेगे, कोई लालच देकर खरीदेगा,
कुल मिला कर वोटर बाटो, वोटर खरीदो और राज करो‘‘
रामलाल बोले।
‘‘छोडो यार, जाने दो, इन बातो मे अपनी शाम क्यूँ खराब करे‘‘
मैने समझाने की कोशिश की।
‘‘नहीं भाई, ये चिंतन का विषय है कोई भी पार्टी, हम वोटरो को देश
के विकास की नई योजनायें क्यो नही बताती? कर्जा माफ करने की,
स्मार्ट फोन बाटने की, हमे लालची और पंगु
बनाने की योजनायें क्यो बताती है? इन बातो पर तो निर्वाचन
आयोग को भी आपत्ती होनी चाहिये, जहाँ वोट के बदले लालच देने की
बात होती है‘‘ रामलाल का स्वर उग्र हो रहा था।
‘‘आपकी बात तो सही है लेकिन
गलती हम लोगों की ही है, हम लोग खुद ही छोटे-छोटे लालच में
पड कर अपने वोट की कीमत नहीं समझते और वोट बैंक बन कर अपने हिस्से का देश बेचने को
तैयार हो जाते है‘‘ मैने धीमे स्वर मे कहा।
‘‘वही तो शर्मा जी, क्या सचमुच ही हम इतने लालची और स्वार्थी हो गये हैं कि अपने स्वार्थ में
हम बीस पच्चीस प्रतिशत के छोटे-छाटे समूह में बंट कर, वोटर न
बन कर, वोट बैंक बनने को तैयार हैं, न
हमे देश का हित चाहिये, न हमे देश की समस्यायें जाननी है,
न उनके समाधान चाहिये, बस खटिया सरकाने का
मौका चाहिये‘‘
रामलाल के इस कथन पर
मैं निरूत्तर था। क्या बोलता,
मैं धीरे से मुस्कराते
हुये, एक प्रश्न कि ‘क्या, जितना ये राजनीति हमें सोचती है, वास्तव में इतने स्वार्थी हो गये हैं?‘ साथ लिये
वापस अपनी धर्म पत्नि के पास आ गया। उधर रामलाल जी फिर जोर-जोर से गाने लगे।
‘‘सरकाय ले ओ खटिया,
जी को जैसो मौका घले...‘‘
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