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शुक्राचार्य के कहने पर कुम्भकर्ण और बिभीषण को अगस्त आश्रम से वापस बुला लिया गया था I अब तीनो भाई शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे I शुक्राचार्य रावण की योग्यता से बहुत अधिक प्रभाबित थे, यद्यपि शुक्राचार्य जानते थे की रावण एक नई रक्ष संस्कृति का प्रणेता है फिर भी उन्हें रावण में ही दैत्यों का भविष्य दिखाई दे रहा था I रावण भी पूरी निष्ठा और लगन से शिक्षा प्राप्त कर रहा था I खाली समय में रावण अपने परम मित्र उपवीत से बाते करना पसंद करता था I
एक दिन शाम के समय रावण और उपवीत आश्रम के पास ही जंगल में घूम रहे थे I घूमते-घूमते रावण ने उपवीत से पूछा “मित्र जो हम सोचते है या जो हम चाहते है, वह हमेशा सच क्यों नहीं होता? जब की मनोविज्ञान के आचार्यो का कहना है कि आप प्रबलता के साथ इच्छाये रखिये सदैव पूर्ण होगी“
“युवराज रावण ! इस ब्रम्हांड में फैली अनन्त उर्जा आपको वह देने को तैयार है जो आप लेना चाहते है, बस निर्भर करता है आपकी इच्छा की प्रबलता और आपकी क्रियाशीलता पर आप जो कुछ भी चाहते है उसके लिए पूर्ण प्रयत्न भी करे“ उपवीत ने समझाया I
“कई बार इस सब के बाबजूद मन के अनुसार प्राप्त नहीं होता क्यों?” रावण ने फिर पूछा I
“मित्र रावण ! हम यही सोचते है की हमें पता है हमारे लिए क्या अच्छा है परंतु ब्रम्हांड में हर और फैली उर्जा हमसे ज्यादा जानती और हमें वह देती है जो वास्तव में हमारे लिए अच्छा होता है“ उपवीत ने बताया I
“वो कैसे?” रावण ने पूछा I
“रावण याद करो, ऋषि अगस्त से शिक्षा प्राप्त करने गए थे, उन्होंने मना कर दिया तुम्हे बुरा लगा परंतु यदि तुमने अगस्त के यहाँ पूर्ण शिक्षा प्राप्त की होती तो क्या तुम यहा शिक्षा लेने आते? क्या तुम्हे शुक्राचार्य शिक्षा देते? क्या तुम पूर्ण भोग विलास से भरे जीवन के बारे में सोचते? क्या तुम राक्षस जाति के प्रणेता बनाते? नहीं मित्र रावण ये सब कुछ कभी नहीं होता ब्रम्हांड की उर्जा ने तुम्हे वही दिया जो तुम्हारे लिए उचित था“ उपवीत ने समझाया I
“ हां मित्र ! हमारे साथ जो हो रहा होता है वही सर्वोत्तम होता है“ उपवीत ने कहा I
“मेरे मित्र मेरे आचार्य बस इतना और बता दो यदि मन चाही वस्तु प्राप्त ना होतो क्या करना चाहिए?” रावण ने फिर पूछा I
“वही जो तुमने किया है“ उपवीत ने कहा I
“अर्थात?” रावण ने पूछा I
“अर्थात यह समझ लो की यदि मनचाही वस्तू प्राप्त ना हो तो मान लो उससे बेहतर वस्तु तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है और राह बदल लो“ उपवीत ने कहा I
“अर्थात मैंने जो कुछ भी किया वो सही था“ रावण ने पूछा I
“संदेह को मन से हटा दो युवराज रावण जब आर्य तुम पर विश्वास नहीं कर रहे तो तुमने रह बदलने के वारे में सोचा फिर तुम दो देवताओं के सारे सुख को इस भूमंडल में लाना चाह रहे हो इसमे गलत क्या सब सही है“ उपवीत ने कहा I
रावण मुस्कुराने लगा I
“अब रात्रि हो रही है चलो आश्रम की और चले“ उपवीत ने कहा, दोनों साथ साथ चल दिए I
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