Page - 13
“ यदि तुम दुनिया को अपने सिद्धांतो पर नही चलाते तो दुनिया तुम्हे अपने नियम से चलाएगी“
“ जो भी अवसर मिले उसका लाभ उठाईये “
उपवीत के कहे शब्द रावन के दिमाग में गूज रहे थे. सोचते सोचते रावन उत्सव स्थल पर आ गया.
“वत्स रावन कहा चले गए थे ? आओ मै तुम्हारा सबसे परिचय करवा दू“ सुमाली ने रावन को देखते ही कहा
रावन सुमाली के साथ साथ चल दिया सुमाली के इशारे पर संगीत ओर नृत्य रुक गया, अब सुमाली ने पूरी सभा से बोलना शुरू किया “मेरे दैत्य बंधुओ ओर दैत्य समर्थक बंधुओ ये है मेरी अति बिदुशी पुत्री कैकसी का परम योद्धा जेष्ठ पुत्र रावन, यह हमारे दुखो का अंत करेगा, यह हमारे परम शत्रु देव अधिपति इंद्र को उसकी दुष्टता का दंड देगा “
“ सेनापति सुमाली तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो की रावन देवताओ को दंड देगा ?“ एक बूढे कालिकेय ने पूछा
“ बुजुर्ग कलिकेय ! मै तुम्हारे प्रश्न की प्रसंसा करता हूँ परन्तु मै इसलिए ऐसा कह रहा हूँ क्यों की मै जानता हूँ की रावन बलशाली है बुद्धिमान है कल ही इसकी बुधि ओर बल का परीक्षण हो चुका है इसने दस धनुष धारीयो को निहत्धे पराजित किया था “ सुमाली ने कहा
“ रावन की बुधि की प्रसंसा तो मैंने अगस्त आश्रम में भी सुनी थी जहा मेरा एक मित्र रूप बदल कर रहता है “ एक अन्य दैत्य ने कहा
“रावन में दस पुरुषो के बराबर बल है जैसे इसके बीस हाथ हो मै आज से इसका नाम दसानन रखता हूँ बोलिए दसानन रावन की जय “ सुमाली ने कहा
सब एक स्वर में बोले “ जय हो ! जय हो! “
“ परन्तु रावन तो खुद मूर्ख आर्यों का वंशज है “ बूढ़े कालिकेय ने कहना जारी रखा“ आर्य खुद तो देवताओ के कहने के अनुसार चलते है फिर एक आर्य पुत्र पर हम कैसे विश्वास कर ले ?“
“रावन मेरा पुत्र है यह मेरे कहे अनुसार चलेगा यह मुर्ख आर्यों को भी देवताओं के बंधन से मुक्त करेगा या उन्हें सबक सिखाएगा “ कैकसी ने गर्व के साथ कहा
“परन्तु ........” कालिकेय कुछ कहना चाह रहे थे की सुमाली बीच में ही बोल पड़ा “ यही तो हमारी योजना थी रावन ने इतने वर्ष आर्यों के बीच में रह कर उनका ज्योतिष, अध्यात्म, विज्ञान, युद्ध कला ,उनके गूढ़ रहस्य सभी कुछ सीखा, आर्यों के वेद विज्ञान को जाना
अब रावन आचार्य शुक्र से दैत्यों की मायावी विद्या, हमारे युद्ध के गूढ़ रहस्य को सीखेगा फिर रावन दैत्य साम्राज्य को पुनः स्थापित करेगा“
“ आप सब रावन पर ब्यर्थ संदेह ना करे उसे पूरा समर्थन देकर उसका मनोबल बढ़ाये रावण ही हमारा उद्धार कर्ता है यही इंद्र को दंड देकर हमारा साम्राज्य स्थापित करेगा “ अब माली ने कहा
“ हम सब सहमत है “ सब ने एक साथ कहा
“ अभी अन्य कोई विकल्प नहीं है इसलिए आप भले ही रावण पर विश्वास कर ले परन्तु हम कालिकेय रावन पर विश्वास नहीं करते “ एक कालिकेय ने कहा
“अभी नहीं तो आप बाद में विश्वास करेगे “ माली ने कहा
“ दसानन रावन की जय “ सुमाली ने कहा
“ जय हो ! जय हो ! “ के नारे गूजने लगे
सभी दैत्य समर्थक जाति का समर्थन रावन को प्राप्त हो चुका था सिवाय कालिकेय के परन्तु रावन अब तक सोंच में था ये हो क्या रहा है . इन लोगो की देवताओ से ऐसी क्या दुश्मनी है ?
जब रावन से नहीं रहा गया तो उसने लोगो को शांत कर बोलना प्रारम्भ किया “ मेरे मात्र पक्ष के मेरे सभी बुजुर्ग मेरे नाना मामा , मेरे भाई आप सब ने मुझ पर विश्वास किया उसके लिए आप सब को मेरा धन्यबाद परन्तु कृपा करके आप सब मुझे अवगत कराये की आप की देव जाति से क्या शत्रुता है ? आप आर्यों को मूर्ख क्यों समझते है ? जब की उनका ही ज्ञान विज्ञान जानने के लिए आप लोग ने मुझे अभी तक आर्यों के गुरुकुल में छोड़ रखा था जहा मुझे केवल अन्याय के बिरुद्ध ही लड़ने की शिक्षा दी गई आपने तो आर्यों का ही पुत्र भी अपने लिए योद्धा चुना जब की आप आर्यों को मूर्ख कहते है मेरा इंद्र या किसी भी देव से कोई बैर नहीं है ना ही उनका मैंने कोई अन्याय देखा है फिर आप क्यों उनके बिरुद्ध युद्ध करना चाहते है ? आप को साम्राज्य स्थापित करना है तो करिए उसमे देवो से बैर क्यों ?”
रावन का प्रश्न सुन कर सारे दैत्य शांत हो गए.
एक कालिकेय वंशी ने प्रसन्न हो कर कहा “देखा मै ना कह रहा था ये आर्यों का वंशज है देखा उनकी ही भाषा बोल रहा है ओर सेनापति सुमाली इसे हमारा रक्षक बनाना चाह रहे है “
“कालिकेय दलपति आप शांत रहिये रावन जो जानता नहीं है उसने वही पूछा है यह उसकी बुधिमत्ता है बिना जाने कोई भी काम नहीं करना चाहिए “ सुमाली ने कालिकेय से कहा फिर वह रावन की ओर घुमा ओर बोला “दसानन रावन यह प्रश्न पूछ कर तुमने सिद्ध कर दिया तुममे हमारे अधिनायक राजा बनने के सारे गुण है मै तुम्हे सब बताऊगा रावन देव जाति अहंकार के मद में डूबी हुई है इस जाति ने हमेशा हमारे पराक्रमी योग्य राजाओ को अपने हितैषी विष्णू की सहायता से छल का प्रयोग कर राज्य सत्ता से बाहर किया चाहे वह हिरन्यकश्यप हो, हिरनाक्ष हो या परम प्रतापी महराज बलि हो सबके साथ छल ही हुआ है. चाहे वह समुद्र मंथन हो या कोई भी सामूहिक प्रयास हमेशा छल हुआ है हमारे साथ, यह सब मै तुम्हे बाद में विस्तार से बताउगा, देव खुद तो सोमरस के मद में ,अप्सराओ की सुन्दरता में, गन्धर्वो के गीत संगीत में डूबे रहते है परन्तु खुद को सर्वश्रेष्ट बता कर आर्यों से अपनी स्तुतिया करवाते है ओर मौका मिलाने पर ऋषि पत्नियो तक से ब्यभिचार करने से नहीं चूकते बताओ आर्य मुर्ख हुए या नहीं, आज हमारी यह दसा की हम जंगलो छिपे पड़े है इन देवताओ के कारन ही है बताओ क्या यह देवो का अन्याय है या नहीं ? “
सुन कर रावन सोचने लगा फिर पूछा “ जब इतना सब है तो आर्य इन देवो का साथ क्यों देते है ?
“ मूर्ख है इसलिए आर्य केवल साथ ही नहीं देते बल्कि हवी के रूप में देवो को कर भी देते है आर्यों का विश्वास है की देव सर्वश्रेष्ट है ओर देव इनकी रक्षा करते है इतना ही नहीं आर्य देव बनने के लिए सारे सुखो को छोड़ देते है जब की देव सारे सुख भोगते है “ सुमाली ने कहा
“ इसका मतलब देव आर्य जाति के साथ भी अन्याय करते है “ रावन ने पूछा
“ हां ओर आर्य अपनी रक्षा के भय से देव जाति का साथ देते है “ सुमाली ने समझाया
“ आर्य चरित्र ज्ञान विज्ञान में इतने श्रेष्ट है फिर भी क्या वो अपनी रक्षा स्यमं नहीं कर सकते “ रावन ने फिर पूछा
“ आर्य खुद योग्य होते हुए भी इन देवो के भय से ग्रस्त है “ सुमाली ने कहा
“ दसानन रावन यह लंका भी कभी हमारी राजधानी हुआ करती आज हम देवो के कारन लंका छोड़ कर लंका के ही जंगल में गुफा में यहाँ छिपे बैठे है “ माल्यबंत ने कहा
“ रावन अब तुम बताओ ये सब सुन कर तुम्हे नहीं लगता देव अन्याई है ? तुम्हे तो अन्याय के बिरुद्ध लड़ने की शिक्षा दी गई है “ सुमाली ने पूछा
रावन सोच रहा था की यह सब तो वह अपनी माँ से कई बार सुन चूका है अपने पिता के यहाँ उसने आर्यों का सरल जीवन भी देखा है.
__________________________________________________






No comments:
Post a Comment